Tuesday, 10 May 2011

सिनेमा की टैगोर पूजा और टैगोर की नाटिर पूजा


चार मई से न्यूयॉर्क में शुरू हुए भारतीय फिल्म समारोह का प्रारंभ हबीब फैजल की ‘दो दुनी चार’ से हुआ और समापन रितुपर्णो घोष की रबींद्रनाथ टैगोर की कथा ‘नौका डूबी’ पर आधारित फिल्म से हुआ। गुरुदेव टैगोर की 150वीं जयंती सारी दुनिया में विविध ढंग से मनाई गई।


कलकत्ता की न्यू थियेटर्स फिल्म निर्माण संस्था को अपने प्रारंभ से ही गुरु रबींद्रनाथ टैगोर का आशीर्वाद प्राप्त था। सिनेमा के उद्भव के समय साहित्यकार इस नए माध्यम को कोई महत्व नहीं देते थे, परंतु गुरुदेव ने इसका स्वागत ही नहीं किया, वरन शांति निकेतन के छात्रों द्वारा अभिनीत अपनी रचना ‘नाटिर पूजा’ का निर्देशन भी किया। न्यू थियेटर्स के स्थायी संगीतकार आरसी बोराल ने फिल्मों में रबींद्र संगीत का उपयोग किया। तमाम बंगाली संगीतकारों की रचनाओं में रबींद्र संगीत ध्वनित हुआ है। दरअसल सौ प्रतिभाशाली लोग जितना काम पूरे जीवन में कर सकते हैं, उससे अधिक सृजन अकेले रबींद्रनाथ टैगोर ने किया।


तपन सिन्हा ने टैगोर के ‘क्षुधितो पाषाण’ पर आधारित फिल्म के प्रारंभिक भाग की शूटिंग भोपाल में की थी और उनकी कथा ‘नौका डूबी’ पर अनेक भारतीय भाषाओं में कई बार फिल्में बनी हैं। हेमेन गुप्ता ने टैगोर की ‘काबुलीवाला’ पर 1961 में बलराज साहनी अभिनीत फिल्म बनाई थी। यह अफगानिस्तान के एक पठान की कहानी है, जो अपनी जन्मभूमि में छोड़कर आई अपनी बेटी की छवि एक भारतीय बालिका में देखता है। इस मर्मस्पर्शी कथा की भावना हम कबीर खान की ‘काबुल एक्सप्रेस’ में भी देखते हैं।


सिनेमा के महाकवि सत्यजित राय ने टैगोर की लघुकथाओं ‘पोस्टमास्टर’, ‘मोनीहारा’ और ‘संपत्ति’ पर ‘तीन कन्या’ नामक फिल्म रची और उनकी टैगोर आधारित ‘चारुलता’ को उनकी श्रेष्ठ फिल्म माना जाता है। सत्यजित राय पर मैरी सेटन ने अपनी किताब में लिखा है कि 1940 में सत्यजित राय के पिता और दादा के मित्र रबींद्रनाथ टैगोर ने राय को शांति निकेतन में अध्ययन के लिए कहा। इसके पहले वे प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्र थे। शांति निकेतन में महान कलाकार नंदलाल बोस से सत्यजित ने कला के पाठ पढ़े और वहां बिताए गए समय में ही वे स्वयं को समझने लगे और अपने निर्णय लेने लगे, जिनमें मूल था फिल्म बनाने का। अत: टैगोर के संक्षिप्त सान्निध्य ने राय को निर्णय करने की क्षमता दी और कालांतर में राय ही टैगोर कथाओं के अन्यतम फिल्मकार सिद्ध हुए।


कुमार साहनी ने टैगोर आधारित ‘चार अध्याय’ 1971 में हिंदी भाषा में बनाई, जो इला की कहानी है। भारत की आजादी की लड़ाई में सशस्त्र कूदे लोगों के संघर्ष और जीवन से जुड़ी इला की दुविधा यह है कि हर दल अपने विचारों को अनुयायी लोगों में इस कदर ठंूसता है कि उनकी वैचारिक शक्ति को सीमित कर देता है। ज्ञातव्य है कि गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी को लिखे अपने कुछ पत्रों में राष्ट्रवाद के महत्व को स्वीकार करते हुए उससे उत्पन्न जुनून की आलोचना की है, जो विचारों का रेजीमेंटेशन करता है। उनकी ‘घरे बाइरे’ में भी विमला को उसका पति संपूर्ण वैचारिक स्वतंत्रता देता है और वह राष्ट्रवादी नेता संदीप की ओर आकर्षित होती है, परंतु शीघ्र उसके मुखौटे के पार देखकर अपने पति की महानता को समझती है, जो आंदोलन में जली बस्तियों के आहतों की सेवा करता है।


दरअसल टैगोर रचित नारी पात्र उस स्वतंत्रता और समानता की बातें सोचती हैं, जो आज भी महिलाओं को उपलब्ध नहीं हैं। शरत बाबू की नारियां दिल हैं तो टैगोर की बुद्धि। रबींद्रनाथ टैगोर जैसी विलक्षण प्रतिभा सदियों में एक बार उभरती है। उसमें कोने-कोने को उजास से भरने की क्षमता होती है। आगरा में ताजमहल को देखकर उनकी लिखी कविता की पहली पंक्ति बहुत बार उद्धृत की गई है ‘समय के गाल पर थमा हुआ आंसू’ और यही कमोबेश गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर का वर्णन भी है।

Monday, 9 May 2011

HIDE AND SEARCH


गाने गाना वाला कुत्ता


चीन में एक गाना गाने वाला कुत्ता पाया गया है। इस म्यूजिकल डॉग का नाम प्रिंस है। गाने गाना वाला यह कुत्ता आश्चर्य का केंद्र बन गया है।
वियर्ड न्यूज एशिया के मुताबिक नौ महीने का यह कुत्ता चीन की एक पेट शॉप में मिला है। पेट शॉप के मालिक हो जिन्ह्यू के मुताबिक उन्हें प्रिंस के इस अनोखे टेलेंट का पता तब चला जब वो एक दिन उसका गाना सुनकर नींद से जाग गए।
हो का कहना है कि प्रिंस के आने के बाद से उनका व्यापार भी काफी बढ़ा है। वो कहते हैं कि प्रिंस की लोकप्रियता के चलते उनकी पेट शॉप पर काफी नए ग्राहक आ रहे हैं।
हो कहते हैं कि प्रिंस के तेज आवाज में बीट्स पर गाना पसंद है। वो प्यार के गीत गाने से बचता है। कई ग्राहक प्रिंस को खरीदने की पेशकस कर चुके हैं लेकिन वो उसे बेचना नहीं चाहते।

इस बोल्ड फोटोशूट ने मचा रखी है सनसनी

Source: Bhaskar Network 

विक्रम भट्ट के आनेवाले सीरियल की अभिनेत्री और बॉलीवुड की अपकमिंग एक्ट्रेस कविता राधेश्याम ने जानवरों के अधिकारों के प्रति आवाज़ उठाने के लिए बोल्ड फोटोशूट कराया है|

उन्होंने इस फोटोशूट में जानवरों की भलाई के लिए कई न्यूड पोज दिए हैं|वैसे ऐसा करने वाली कविता पहली अभिनेत्री नहीं हैं उनसे पहले कई अभिनेत्रियां जानवरों के अधिकारों के प्रति लोगों को सजग करने के लिए न्यूड हो चुकी हैं|कविता जल्द ही पांच घंटे में पांच करोड़ और ओम अल्लाह जैसी फिल्मों में नजर आएंगी|

कविता ने सुभाष घई के एक्टिंग इंस्टीट्युट से एक्टिंग में डिग्री ली है|कविता इस बेहद उत्तेजक फोटोशूट से एकाएक चर्चा में आ गयी हैं और यह उनके एक्टिंग करियर के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है|देखिये उनके इस फोटोशूट की तस्वीरें:

शाहरूख का 'गे' किस!


बॉलीवुड के बादशाह शाहरूख खान ने कई शो में 'गे' कॉमेडी की है, लोगों को यह बात अच्छी भी लगती है। किंग खान ज्यादातर अवार्ड फंक्शन में 'गे' कॉमेडी के द्वारा लोगों को बांधे रहते हैं। लेकिन हम आज ऐसी पिक्चर की बात कर रहे हैं जो इंटरनेट पर खूब देखी जा रही है।

जब कोई व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को गले लगाकर गाल पर किस करे तो यह बात तो समझ में आती है। पर जब कोई लिप टू लिप किस करे तो उसे लोग शक की निगाहों से देखते हैं। लेकिन हाल ही में इसी तर्ज पर शाहरूख खान ने लिप किस किया है अब आप क्या कहेंगे। इंटरनेट पर काफी चर्चित इस फोटो पर लिखा है कि "सुपरस्टार की 'गे' लिप किस"।

सूत्रों की मानें तो हाल ही में छोटे परदे के जॉनथॉन रोस के शो में शाहरूख खान आये थे और उन्होंने रोस को कुछ इस अंदाज में किस किया कि लोग देखकर दंग रह गये। मौजूदा समय में फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट पर यह फोटो घूमती फिर रही है। दूसरी तरफ इस फोटो को थोड़ा मार्फ भी कर दिया गया है। जिससे यह शक भी हो रहा है कि इस फोटो में कुछ गड़बड़ झाला भी हो सकता है।

१९७१ की जंग में मानेक शॉ के कारण मारे गए ५७ भारतीय सैनिक!


नई दिल्ली. 1971 में पाकिस्तान से जंग जीतने पर भले ही फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ ने वाहवाही लूटी हो, लेकिन जंग में उन्होंने कई रणनीतिक गलतियां की थीं। यह बात उनके जूनियर पूर्व लेफ्टनेंट जनरल जेएफआर जैकब ने अपनी आत्म कथा ‘एन ओडिसी इन वॉर एंड पीस’ में लिखी है। उन्होंने यह भी लिखा है कि मानेक शॉ ने २३ नवंबर १९७१ को हिली सेक्टर में गैर-जरूरी ऑपरेशन चलाया, जिसमें ५७ भारतीय सैनिक बेवजह मारे गए। शॉ के जूनियर अधिकारी रहे जैकब ने इसमें कई चौंकाने वाले दावे किए हैं। जंग के समय जैकब ईस्टर्न आर्मी कमांड के चीफ ऑफ स्टाफ थे। उन्होंने सैम के साथ कई और उच्च अधिकारियों का नाम भी लिया है। उल्लेखनीय है कि 1971 के इसी जंग ने बांग्लादेश को दुनिया के नक्शे में ला दिया।

जैकब ने आत्मकथा में दावा किया कि सैम ने ढाका पर नियंत्रण करने से मना किया था, जबकि वह आपरेशन का मुख्य हिस्सा था। उन्होंने लिखा, मैं हैरान था। मुझे सैम की नीति समझ नही आ रही थी। ढाका पर नियंत्रण कर हम पूरे पूर्वी पाकिस्तान पर नियंत्रण कर सकते थे लेकिन सैम ने ऐसा करने से मना कर दिया।

उन्होंने पाकिस्तानी नौसेना के संदेश को भी प्रसारित करने का आदेश दे दिया जिसे गुप्त रूप से रिकॉर्ड किया गया था। प्रसारण के बाद से पाकिस्तान ने अपना कोड बदल दिया और आगे संदेशों को सुनना मुश्किल हो गया। जैकब ने आगे लिखा, सैम के तत्कालीन चीफ एयर मार्शल पीसी लाल से भी अच्छे संबंध नहीं थे।

उन्होंने बांग्लादेश में पाकिस्तानी पोस्ट पर हवाई हमले की नीति बनाने के लिए लाल से बात करने से इंकार कर दिया था। नंबर चार को भाग्यशाली मानने वाले सैम ने सेना को चार दिसंबर को ही हमला करने का आदेश दे दिया जबकि योजना कुछ और थी। उनका मानना था कि पाकिस्तानी सेना म्यांमार भागने वाली है जबकि यह बात आधारहीन थी।

जैकब ने लिखा है कि मानेक शॉ को केवल ‘यस मैन’ पसंद थे। उन्होंने बताया कि तत्कालीन ईस्टर्न आर्मी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा खुद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सलाहकार डीपी धर को ड्रिंक्स सर्व करते थे।

जैकब के अनुसार मानेक शॉ के तत्कालीन एयर चीफ प्रमुख से भी ठीक संबंध नहीं थे और दोनों के बीच बातचीत भी नहीं होती थी। लेकिन लेफ्टिनेंट जनरल दीपेंद्र सिंह, जो १९६९ से १९७३ के बीच मानेक शॉ के सहायक रहे, ने कहा कि जैकब में काफी अहम है और उनका मानना है कि युद्ध उन्हीं की वजह से जीता गया।  जबकि 1971 में जीत मानेक शॉ की रणनीति के ही कारण मिली थी।
आपका मत

क्या वाकई पूर्व लेफ्टनेंट जनरल जेएफआर जैकब की पुस्तक में लिखी बातों पर यकीन किया जाए कि मानेक शॉ
 की रणनीति के कारण भारतीय सेना को कई झटके लगे। क्या वाकई फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ ने १९७१ की जंग में कई रणनीतिक गलतियां की थीं? आप भी दे सकते हैं इस पर अपना मत।

जीवन के बर्तन में भोगे यथार्थ की तलछट

संजय लीला भंसाली का कहना है कि वे मुंबई के निम्न-मध्यम वर्ग के पायोधोनी, भिंडी बाजार में पले हैं और उन्होंने गरीबी, गंदगी और भीड़ देखी है। वे कटु अनुभव आज भी उन्हें त्रास देते हैं और उस यथार्थ से दूर वे अपनी फिल्मों में एक काल्पनिक और भव्य संसार रचते हैं। यथार्थ के पात्रों को उन्होंने ‘सांवरिया’ में एक कल्पना संसार में प्रस्तुत किया। ‘गुजारिश’ के पात्र एक पुरानी टूटी हवेली में रहते हैं और इसके बावजूद भव्यता का एहसास होता है। हर व्यक्ति यथार्थ से घबराकर कुछ क्षणों के लिए अपने निजी कल्पना संसार में सुस्ताता है, परंतु फिल्मकार को अपना कल्पना संसार इस तरह रचना होता है कि दर्शक उससे तादात्म्य स्थापित कर सकें।



आजकल ‘वांटेड’ के लिए प्रसिद्ध प्रभुदेवा के निर्देशन में संजय लीला भंसाली ‘राउडी राठौर’ नामक फिल्म का निर्माण कर रहे हैं। ‘खामोशी’ से ‘गुजारिश’ तक के सफर में भंसाली ने एक्शन फिल्म नहीं बनाई थी, परंतु शायद कभी उनके प्रिय नायक रहे सलमान खान की एक्शन फिल्मों की विराट सफलता ने उन्हें प्रेरित किया है। ‘सांवरिया’ और ‘गुजारिश’ के बाद उनकी निर्माण संस्था को भी एक सफलता की आवश्यकता है। इस संदर्भ में यह गौरतलब है कि शाहरुख खान ने एक बार भंसाली से कहा था कि हिंसा का एक रेशा उनके व्यक्तित्व में है और उन्हें एक्शन फिल्म बनानी चाहिए। प्रेम कहानी बनाते समय भी भावना की तीव्रता में एक किस्म की हिंसा या कहें आक्रामकता निहित रहती है। भंसाली की यह प्रवृत्ति ‘हम दिल दे चुके सनम’ में भी नजर आती है और ‘ब्लैक’ में भी। हिंसा या आक्रामकता का अर्थ महज खून बहाना नहीं होता, आत्मा को आहत करना भी होता है। इस मामले में कड़वे शब्दों की मारकता को किसी तलवार के वार से कम नहीं आंक सकते। कुछ व्यक्तित्व इतने तल्ख होते हैं कि जहां से गुजरें, वहां लोग भीतर से लहूलुहान हो जाते हैं।



संजय लीला भंसाली के पिता भी इसी उद्योग में थे, परंतु घाटे के कारण परिवार को कष्टï झेलने पड़े। उस समय संजय छोटे थे और उनकी मां ने अकेले ही लड़ाई लड़ी। गौरतलब यह है कि श्रीमती लीला भंसाली ने कोई कड़वाहट नहीं पाली, परंतु पुत्र ने उस दौर को सीने में संजोए रखा है। दुख-सुख में हर व्यक्ति अपने ढंग से प्रभाव ग्रहण करता है।



यह संभव है कि संजय भंसाली ने उस कड़वाहट की हवा से अपने सृजन की आग बढ़ाई हो। उन्हें कुछ साबित करना था। अपने भोगे हुए सच से बचने के लिए उन्होंने फंतासी रची और अपनी सृजन प्रक्रिया का विकास किया। ब्रांड बन जाने के कारण उनके निजी सिनेमाई सनकीपन पर सार्वजनिक पैसा लगा और उन्हें तो करोड़ों का मुनाफा ही हुआ है। सिनेमा उद्योग की मौजूदा आर्थिक व्यवस्था कुछ ऐसी ही है। इस समय वह बतौर निर्माता बहुत व्यस्त हैं और विगत पांच-सात वर्षों से अपनी संपादक बहन बेला भंसाली की निर्देशकीय पहल की बात करते रहे हैं। अब फिल्मकार फरहा खान को नायिका लेकर बेला की फिल्म ‘शीरीं फरहाद’ शुरू हो रही है।



यह शीरीं फरहाद की पुरानी प्रेमकथा नहीं होकर चालीस वर्षीय पारसी स्त्री-पुरुष की प्रेम कथा है। ज्ञातव्य है कि संजय की ‘सांवरिया’ और फरहा की ‘ओम शंाति ओम’ एक साथ प्रदर्शित हुई थीं और उस वक्त दोनों के बीच बहुत कड़वाहट हो गई थी। दोनों ने ही नृत्य-गीत निर्देशन से कॅरियर शुरू किया - संजय ने ‘1942 ए लव स्टोरी’ से और फरहा ने आमिर खान की ‘जो जीता वही सिकंदर’ से। बहरहाल, यह हास्य फिल्म दो दोस्त-दुश्मनों को पुन: दोस्त बना रही है। संजय और बेला भंसाली सगे भाई-बहन हैं, परंतु उनकी निर्देशकीय शैली भिन्न होगी, क्योंकि अभावों का समान बचपन जीते हुए भी उस कड़वाहट के प्रति दोनों का दृष्टिïकोण अलग-अलग है।