Friday, 13 May 2011

हम दोस्त थे हमशक्ल नहीं


जब मैं पहली बार इंग्लैंड गया था, तब मुझे यह चिंता सता रही थी कि मैं अंग्रेज लड़कियों से दोस्ती कैसे करूंगा। मुझे डर था कि मेरे हुलिये के कारण लड़कियां मेरी तरफ आकर्षित नहीं होंगी। सौभाग्यवश ऐसा नहीं हुआ।

वास्तव में मुझे अपने खास हुलिये के कारण ही एक विशुद्ध भारतीय समझा गया, जबकि मेरे चिकने-चुपड़े साथियों को भूरे अंग्रेज कहकर नकार दिया गया। लंदन यूनिवर्सिटी में हम तीन दोस्त थे। इन्हीं में से एक थे तरलोक सिंह। वे बहुत पढ़ते-लिखते थे। बाद में वे सिविल सेवा में चले गए और योजना आयोग के अध्यक्ष बने।

मेरे दूसरे दोस्त थे बसंत सिंह। वे केन्या से आए थे और बहुत अच्छे क्रिकेट खिलाड़ी थे। तब तक मैंने अपने जीवन में कोई तीर नहीं मारा था। हम तीनों दोस्तों में कोई समानता नहीं थी, लेकिन इसके बावजूद अंग्रेज हमेशा हम तीनों को पहचानने में गलती कर जाते थे।

तरलोक सिंह प्रोफेसर हेरॉल्ड लास्की के प्रिय छात्र थे और वे मुझे अक्सर तरलोक समझकर अपनी किताबें दे दिया करते थे।

एक और मजेदार घटना तब घटी, जब कैम्ब्रिज के सेल्विन कॉलेज में पढ़ने वाले अमरजीत सिंह वेल्विन गार्डन सिटी में सप्ताहांत बिताने आए। तब मैं जंगल के निकट एक कॉटेज में रह रहा था। उस वक्त जंगल में रोडोडेंड्रन फूलों की बहार आई हुई थी।

अमरजीत सिंह ने कैम्ब्रिज लौटने से पहले जंगल घूमने का निश्चय किया। वहां उन्हें एक बुजुर्ग महिला मिली और उसने उनके साथ इस तरह व्यवहार किया, जैसे वे उन्हें जानती हों। कुछ देर गपशप करने के बाद अमरजीत ने उन्हें कहा कि शायद वे उन्हें खुशवंत समझ रही हैं, जो कि उनका दोस्त है।

महिला ने माफी मांगते हुए कहा: ‘मुझे भी पहले-पहल ऐसा ही लगा था कि तुम खुशवंत नहीं हो, लेकिन मैं निश्चित नहीं थी।’ कुछ समय बाद उनकी रेलवे स्टेशन पर भेंट हुई। महिला ने उनका अभिवादन किया और उनसे कहा : ‘पता है खुशवंतजी, मेरी आपके एक दोस्त से भेंट हुई थी और मैंने उनसे यह समझकर बातें करनी शुरू कर दी कि वे आप हैं!’

मुझे जेरूसलम का भी एक वाकया याद आता है। मैं किंग डेविड होटल में ठहरा हुआ था। एक शाम डायनिंग रूम में मैंने एक खाली टेबल देखी तो मैं वहां जाकर बैठ गया। समीप की टेबल पर एक अमेरिकी दंपती बैठे थे। उन्होंने मुझे देखा और फिर एक-दूसरे के कान में कुछ फुसफुसाने लगे।

इसके बाद महिला का पति उठकर मेरे पास आया और उसने मुझसे पूछा: ‘एक्सक्यूज मी, क्या आप अंग्रेजी बोलते हैं?’ मैंने कहा: ‘जी हां।’ उन्होंने पूछा: ‘मैं और मेरी पत्नी सोच रहे थे कि आप किस देश से आए होंगे।’ मैंने सोचा कि इन दोनों से थोड़ा मजाक किया जा सकता है।

मैंने कहा: ‘मैं आपके सामने तीन विकल्प रखता हूं। यदि आप सही साबित हुए तो मैं आपकी ड्रिंक्स का खर्चा उठाऊंगा।’ उस व्यक्ति ने कुछ देर सोचा और फिर कहा: ‘क्या आप यहूदी हैं?’ मैंने जवाब दिया: ‘जी नहीं।’ फिर उन्होंने पूछा : ‘तो क्या आप मुस्लिम हैं?’ मैंने कहा: ‘नहीं, मुस्लिम भी नहीं।’

उन्होंने अपने अंतिम विकल्प का उपयोग करते हुए पूछा: ‘तब तो आप बौद्ध होंगे।’ मैंने कहा: ‘मैं बौद्ध भी नहीं हूं।’ उन्होंने कहा: ‘मैं हार मानता हूं। आप बताइए कि आप कौन हैं?’ मैंने जवाब दिया: ‘मैं सिख हूं।’ उन्होंने कुछ देर सोचा और फिर कहा: ‘तब तो आप सिक्किम के होंगे।’

कौन हूं मैं: मैं कोलमैन बार्क्‍स द्वारा किए गए रूमी के अनुवाद पढ़ रहा था। मैं इन्हें कई बार पढ़ चुका था। इसलिए इस बार पुस्तक के वे ही अंश पढ़ रहा था, जिन्हें मैंने रेखांकित किया था। यहीं मुझे वे पंक्तियां मिलीं, जिन्हें पढ़कर मुझे लगा कि यही तो मेरे विश्वासों का सारांश है।

मुझे नहीं पता मैंने इन पंक्तियों को पहले कभी उद्धृत किया है या नहीं। लेकिन अगर मैंने पहले कभी उद्धृत किया भी है, तब भी वे इस योग्य हैं कि उन्हें फिर से दोहराया जाए। वे इस प्रकार हैं:
ईसाई नहीं। यहूदी या मुस्लिम नहीं।
हिंदू, बौद्ध, सूफी या जेन भी नहीं।

न किसी धार्मिक-सांस्कृतिक प्रणाली के तहत।
मैं न पूर्व से आया न पश्चिम से।
न समुद्र से निकला न उगा धरती पर।

न लौकिक, न अलौकिक।
किसी भी तत्व से
निर्मित नहीं हुआ मैं।
मेरा कोई अस्तित्व नहीं।
मैं न इस लोक का न परलोक का।
न आदम और हव्वा की संतान।
न सृष्टि की उत्पत्ति की
किसी कहानी की उपज।
मेरी कोई जगह नहीं
कहीं कोई निशान नहीं।
मैं जानता हूं तो केवल अपने प्रिय को।
मैंने दो दुनिया को एक की तरह देखा है।
और वह एक दुनिया पुकारती है
प्रथम, अंतिम, बाहरी, भीतरी,
केवल एक सांस को
सांस लेते इंसान को।

डिनर केक: संता इंग्लैंड में पांच साल बिताने के बाद अपने गांव लौटा। वह इंग्लैंड में वर्क वीजा पर रह रहा था। वह गांव में शेखी बघारने लगा और देहातियों पर अंग्रेजी का रौब झाड़ने लगा। एक बार वह अपने दोस्त बंता के साथ सुबह की सैर पर निकला था। रास्ते में गोबर पड़ा था।

संता ने उसे देखकर कहा: ‘ओह, दिस इज ए केक।’ बंता ने फौरन तुक मिलाते हुए कहा: ‘इसनूं चख के वेख।’ इसके बाद संता ने कभी अंग्रेजी बघारने की कोशिश नहीं की।
(सौजन्य: रामनिवास मलिक, गुड़गांव)

जैसा अपराध, वैसी ही सजा?

न्यायशास्त्र का एक बुनियादी नियम है: अपराधी को दिया जाने वाला दंड हमेशा उसके अपराध के अनुरूप होना चाहिए। लेकिन किसी बलात्कारी को उसके अपराध के लिए कारावास की सजा सुना देने से इस नियम की पुष्टि नहीं होती।

तो फिर क्यों न उसे उसके पुरुषत्व से ही वंचित कर दिया जाए, ताकि वह आगे से इस अपराध को दोहरा पाने की स्थिति में ही नहीं रहे। यह सुझाव दिल्ली उच्च न्यायालय का है।

उच्च न्यायालय ने सुझाया है कि इस तरह का कोई कानून लागू करने के बाद बलात्कार की घटनाओं पर रोक लगाने में काफी मदद मिल सकती है। अब यह किसी संसद सदस्य की जिम्मेदारी है कि वह विधेयक का मसौदा प्रस्तुत करे, ताकि अगले सत्र तक उसे अमल में लाया जा सके।

बहुत संभव है कि इस विधेयक को किसी के भी विरोध का सामना न करना पड़े और सभी पार्टियों द्वारा सर्वसम्मति से इसका समर्थन किया जाए। इससे भी अच्छा यह होगा कि कानून मंत्री ही अपने स्तर पर कुछ पहल करें। इस तरह के कानून से सरकार की प्रतिष्ठा में वृद्धि ही होगी।

मुझे तो कोई संदेह नहीं कि यह कानून लागू होने से बलात्कार की घटनाओं में खासी कमी आएगी। यह उतना ही आवश्यक है, जैसे हत्या के अपराध में मृत्युदंड की सजा सुनाई जाना। वास्तव में नए कानून का असर मृत्युदंड से भी ज्यादा हो सकता है, क्योंकि हकीकत तो यही है कि पुरुष मृत्यु से भी अधिक अपना पुरुषत्व गंवा देने से घबराते हैं!

एक थैरेपी यह भी

हमारे देश के कई लोगों का यह मानना है कि गाय के दूध के साथ ही गोमूत्र का सेवन करना भी हमारी सेहत के लिए फायदेमंद साबित होता है। इसी तरह अरबवासियों का यह मानना है कि ऊंटनी के दूध के साथ ही उसके मूत्र का सेवन करने से कई बीमारियां हवा हो जाती हैं।

अभी तक मुझे इस बारे में पता नहीं था। जब मैंने प्राइवेट आई का नया अंक देखा तो मुझे इस रोचक खोज के बारे में विस्तार से जानकारी मिली।

जेद्दा में किंग फहद मेडिकल रिसर्च सेंटर में हुई एक वार्ता में डॉ फतेन अब्दुर्रहमान खुर्शीद ने इसके बारे में तफसील से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि वे ऊंटों के मूत्र पर सात साल से प्रयोग कर रहे थे और अब उन्हें कोई संदेह नहीं है कि कैंसर का इलाज करने में ऊंट का मूत्र प्रभावी भूमिका निभा सकता है।

उन्होंने जो दवाई तैयार की है, वह ऊंटनी के दूध और मूत्र का मिश्रण है। इस दवाई का सफल परीक्षण ल्यूकेमिया से ग्रस्त चूहों पर किया जा चुका है और अब मनुष्यों पर इसका परीक्षण किया जा रहा है। कैंसर के साथ ही यह दवाई विटिलिगो, एक्जिमा और सोरियासिस जैसे त्वचा संबंधित रोगों के लिए भी कारगर साबित हो सकती है।

मूत्र के सूक्ष्म घटक कैंसर की कोशिकाओं पर आक्रमण कर उन्हें सफलतापूर्वक नष्ट कर देते हैं। इस दवाई को विभिन्न स्वरूपों में ग्रहण किया जा सकता है, जैसे सीरप, कैप्सूल, मरहम, साबुन या जैल।

उन्होंने बताया कि परीक्षणों से यह स्पष्ट हुआ है कि ऊंट के मूत्र से किसी भी प्रकार के नुकसानदेह साइड इफेक्ट नहीं होते हैं और इसके सेवन से महज एक माह में ही टच्यूमर के आकार को कम किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि ऊंट के मूत्र का स्वास्थ्य के लिए उपयोगी होना अरब क्षेत्र में सदियों से प्रचलित एक मान्यता भी है, जो समय के साथ अब वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर भी प्रमाणित हो रही है।

विभिन्न प्रयोगों के बाद एबीसी (अरब बायोटेक्नोलॉजी कंपनी) की साबा जसीम ने यह भी बताया कि ऊंट की रोग प्रतिरोधक क्षमता अन्य प्राणियों की तुलना में कहीं अधिक होती है। ऊंट के मूत्र से निर्मित इस दवाई को यूके पेटेंट ऑफिस से पंजीकृत भी किया जा चुका है।

हमारे पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई का भी यही मानना था कि अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्वमूत्र सेवन किया जाना चाहिए। उनकी इस धारणा के दुनियाभर में कई समर्थक भी हैं। जहां तक मेरा सवाल है तो मेरे लिए इस तरह की तमाम खोजें रोचक जरूर हो सकती हैं, लेकिन वास्तव में किसी भी तरह के मूत्र के सेवन के बारे में विचार करना भी मेरे लिए संभव नहीं है।

सरदार या असरदार

मेरे मित्र और भोपाल के पूर्व अतिरिक्त कलेक्टर ओपी शर्मा ने मुझे एक मजेदार बात बताई। उन्होंने बताया कि किसी भी हिंदी शब्द के आगे ‘अ’ उपसर्ग लगाने से उसका अर्थ नकारात्मक हो जाता है, जैसे : विश्वास का अविश्वास, शांति का अशांति, कुशल का अकुशल, ज्ञान का अज्ञान, शिक्षित का अशिक्षित इत्यादि।

लेकिन सरदार एकमात्र ऐसा शब्द है, जिसके आगे ‘अ’ लगा देने से उसका अर्थ सशक्त और सकारात्मक हो जाता है, क्योंकि ‘अ’ उपसर्ग लगाने के बाद सरदार और असरदार हो जाता है।

बीवी के प्यार से होशियार

रामलाल ने अपने मित्र शामलाल से कहा: ‘मैं बहुत खुशनसीब हूं।’ शामलाल ने उससे पूछा कि उसे यह खुशफहमी क्यों है, तो उसने जवाब दिया: ‘जब भी मैं काम से घर लौटता हूं तो मेरी पत्नी बहुत प्यार से मुझे अपनी बांहों में लेकर मेरा स्वागत करती है।

ऐसे कितने लोग हैं, जिन्हें उनकी पत्नी का इतना प्यार मिल पाता है?’ शामलाल ने सोच-समझकर जवाब दिया: ‘यह तुम्हारी पत्नी का प्यार नहीं, बल्कि उसकी सतर्कता है।

वास्तव में वह यह जांच-पड़ताल कर लेना चाहती है कि कहीं तुम्हारे मुंह से शराब की गंध तो नहीं आ रही है या तुम्हारे शरीर पर कहीं लिपस्टिक का निशान तो नहीं है। लिहाजा, अपनी बीवी के प्यार से होशियार!’

Shinkansen daibakuha a.k.a. THE BULET TRAIN (1975) MOVIE REVIEW

Storyline

One of the Japanese Shinkansen "Bullet Trains" is threatened with a bomb that will explode automatically if the train slows below 80 km/h, unless a ransom is paid. Police race to find the bombers and to learn how to defuse the bomb.

Review
High drama aboard the Bullet Train

I picked up a six-pack of Sonny Chiba movies and this was one of them. Lucky for me it was the uncut, original Japanese language version!! The Bullet Train is a bit of a more complex drama than the much later "Speed" which was pretty much a straight action movie. There are key differences between the two. "Speed" uses an over-the-top villain type in Dennis Hopper, a man completely evil who we're not expected to sympathize or feel sorry for. "Bullet Train"'s villain is a more complex, serious, darker sort of character, and we come to understand and even sympathize a little with his reasons for ransoming the Bullet Train.

I found it a little long at 2 1/2 hours. But I liked that it was a more serious film than Speed, delving into the ransomer's motives and the consequences of his actions, not just for his victims but for his accomplices, the train company employees, and himself. And 1.5 hours in, I realized I had no idea how it was going to end.

If you enjoy Japanese cinema in general, this isn't one of the best films, but you will probably enjoy it as I did. 

Directed by
Jun'ya Satô 
 
Writing credits
Ryunosuke Ono (screenplay) &
Jun'ya Satô (screenplay)
Arei Katô (story)

Cast

Ken Takakura Ken Takakura ...
Tetsuo Okita
Sonny Chiba Sonny Chiba ...
Aoki (as Shin-ichi Chiba)
Kei Yamamoto Kei Yamamoto ...
Masaru Koga
Eiji Gô Eiji Gô ...
Shinji Fujio
Akira Oda Akira Oda ...
Hiroshi Ôshiro
Raita Ryû Raita Ryû ...
Kikuchi
Masayo Utsunomiya Masayo Utsunomiya ...
Yasuko
Yumiko Fujita Yumiko Fujita ...
Akiyama
Yumi Takigawa Yumi Takigawa ...
SAS Staff
Etsuko Shihomi Etsuko Shihomi ...
Telephone Operator
Fumio Watanabe Fumio Watanabe ...
Miyashita
Toyoto Fukuda Toyoto Fukuda ...
Tashiro
Hiroko Fuji Hiroko Fuji ...
Female Teacher
Junko Matsudaira Junko Matsudaira ...
Cashier
Koreharu Hisatomi Koreharu Hisatomi ...
Hirota

107 शादियां, 185 बच्चे! सफर जारी है...

बिडा (नाइजीरिया). पेशे से ओझा 87 वर्षीय बेल्लो मसाबा अब तक 107 शादियां कर चुके हैं, जिनसे उन्हें 185 बच्चे हैं। इनमें से 86 बीवियां और 133 बच्चे जीवित हैं। इसके बाद भी मसाबा को यदि शादी का प्रस्ताव मिलता है तो वे इनकार नहीं करेंगे। मसाबा की सबसे छोटी पत्नी 19 वर्ष की है, जबकि उम्र के लिहाज से सबसे अधिक आयु की पत्नी 64 साल की है। उसकी नौ पत्नियों की मौत हो चुकी है। नाफरमानी के कारण वह 12 को तलाक दे चुका है। 40वें नंबर की पत्नी ऐशेतु डयाको कहती हैं कि हमारा कभी झगड़ा नहीं हुआ।

घर में बच्चें की फौजः मसाबा के 185 बच्चों में से 133 जीवित हैं। इनमें सबसे छोटे बच्चे की आयु महज एक माह है। बच्चों के बारे में पूछने पर मसाबा जवाब देने से पहले ठिठकते हैं और फिर जवाब देते हैं। चार मंजिला मकान में 89 कमरे और बहुत बड़ा बरामदा है।

खूब कमाई होती है ओझा कीः मसाबा समृद्ध हैं, क्योंकि इलाज करवाने के नाम पर आने वाले लोग उन्हें अच्छी खासी रकम देते हैं। इसी कमाई के दम पर वह अपने भरे-पूरे परिवार को बिना किसी दिक्कत के पाल रहा है।

सरकार और समाज से बैर: नाइजीरिया में शरीअत लागू है और कुरान में सिर्फ 4 पत्नियां रखने की अनुमति है, ताकि सभी से अच्छा व्यवहार किया जा सके। तीन साल पहले मसाबा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन उसकी सभी पत्नियों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। कोर्ट में प्रत्येक पत्नी ने अपनी खुशहाली और रजामंदी की जानकारी दी।

दुकानदार से ओझा बनने की कहानीः स्कूल के बाद मसाबा 21 साल तक सामान्य कपड़ा दुकानदार बनकर रहा। उसकी दो पत्नियां थी। उसकी तबीयत खराब हो गई। डॉक्टरों की दवाई काम नहीं आई। उसके अनुसार उसे महा दूत गैब्रिअल ने दर्शन दिए। वह ओझा बन गया और लोगों की बीमारियों को दूर करने लगा। 1980 के दशक में उसने ईश्वर आज्ञा से शादियां करना शुरू की। एक साल में चार-पांच शादियां तक उसने कीं।

बिपाशा ने दी खुली चुनौती, 'कोई साबित करके बताए टेप में आवाज़ मेरी है'

बॉलीवुड अभिनेत्री बिपाशा बसु ने उनके व समाजवादी पार्टी (सपा) के पूर्व नेता अमर सिंह के बीच बातचीत के कथित टेप पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। बिपाशा ने खुली चुनौती दी है कि कोई भी यह साबित कर दे कि टेप में जो आवाज है वह उन्हीं की है।
बिपाशा ने गुरुवार को ट्विटर पर लिखा, "मैं आप सभी से अनुरोध करती हूं कि आप पहले इस बातचीत को सुनें और यदि इसके बाद भी आपको लगता है कि इसमें मेरी ही आवाज है, तो मैं खुली चुनौती देती हूं कि कोई भी व्यक्ति साबित कर दे कि यह मैं ही हूं।"
अमर सिंह से बातचीत के टेप को मीडिया में जारी अथवा प्रकाशित किए जाने पर रोक लगी हुई थी लेकिन बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने यह रोक हटा दी थी। कहा जा रहा है कि इनमें से एक टेप में बिपाशा की आवाज है।
बिपाशा मानती हैं कि अफवाहें किसी भी फिल्मी हस्ती के जीवन का हिस्सा होती हैं लेकिन वह कहती हैं कि इस तरह के आरोपों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
बिपाशा कहती हैं कि यदि उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा किया गया तो वह इस मुद्दे को मजबूती से उठाएंगी। उन्होंने कहा कि इस तरह की झूठी कहानियां गढ़ना हास्यास्पद और अनैतिक है।
आपकी राय:क्या कथित टेप में रिकॉर्ड की गई आवाज़ बिपाशा की है,या बिपाशा सच कह रही हैं कि यह आवाज़ उनकी नहीं  है?क्या किसी कि निजी बातचीत को इस तरह से सार्वजनिक करना सही है?आपको क्या लगता है आप अपनी राय हमें नीचे दिए कमेंट बॉक्स में जाकर मर्यादित भाषा में दे सकते हैं| 

विवादों में 'लव यू मिस्टर कलाकार'


आज रिलीज हुई राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'लव यू मिस्टर कलाकार' भी विवादों में आ गई है। न्यू दिल्ली वाइल्ड लाइफ के वार्डन चीफ और पुलिस कमीश्नर ऑफ दिल्ली को शिकायतकर्ता अभिषेक कदयान ने वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के तहत फिल्म के निर्माता-निर्देशक और सिनेमा हाल मालिकों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है।

अभिषेक का कहना है कि फिल्म में जिस ब्रश को तुषार कपूर ने बतौर काटरूनिस्ट इस्तेमाल किया है, वह नेवला के बालों से बना होता है। जिसका इस्तेमाल वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन के दायरे में आता है। इसलिए उन्होंने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की बात कही है।
 

'माया' काल से भी पुरानी थी यह रहस्यमयी सभ्यता

सेंट्रल अमेरिका के होंडूरास गणराज्य में कोपन के पास माया सभ्यता से भी पुराने अवशेष मौजूद हैं। मैक्सिको के पुरातत्व शास्त्री विक्टर हेरेडिआ के अनुसार इसे एनकाउंटर्स का शहर कहते हैं। इस इलाके में ताव्हाकस इंडियंस रहते हैं। अलबत्ता ये पता नहीं चलता कि सदियों पहले यहां कौन-सी सभ्यता बसा करती थी।

जानकारी के अनुसार यहां जिस इलाके में दो नदियां मिलती हैं, वहां करीब 12 एकड़ में ये शहर बसता था। आज भी यहां पत्थरों से बने स्मारक और स्तंभ मौजूद हैं। समझा जाता है कि ये 300 ईसापूर्व से 300 ईस्वी के बीच बने होंगे।

हेरेडिया के अनुसार इस स्थान पर प्री-हिस्पेनिक (स्पेनिश शासन से पहले का) शहर बसता था। वैसे अब तक इस पर बहुत ज्यादा रिसर्च नहीं हुई है। फिर भी जितनी रिसर्च हुई है, उससे इस शहर की स्थापना की जानकारी नहीं मिलती। यहां मिले अवशेषों को देखकर बहस होती है कि ये लोग विलुप्त हो चुके लेमुरिया से संबंधित रहे होंगे। इन्हें भी गलत साबित नहीं किया जा सका है।

राज है गहरा

होंडूरास गणराज्य में एक पुरानी सभ्यता के अवशेष मिलते हैं। काफी रिसर्च के बाद भी इसकी सही उम्र और अन्य चीजों के बारे में कुछ पता नहीं लगाया जा सका है। कुछ लोग इसे लेमुरिया की खोई हुई दुनिया से भी जोड़ते हैं।