Saturday, 28 May 2011

इन पांच रचनाओं ने हर दौर को अपना कायल बना लिया



साहित्य और सिनेमा के बारे में अक्सर ये बात कही जाती है कि हम जिस लायक होते हैं हमें उसी स्तर का साहित्य और सिनेमा देखने को मिलता है। आज भारतीय सिनेमा दुनिया की सबसे बड़ी फिल्म इंडस्ट्री है जहां हर साल औसतन एक हजार फिल्में बनती हैं।





इस श्रृंखला में हम आपको भारतीय सिने जगत की ऐसी दस फिल्मों से रूबरू कराने जा रहे हैं जिन्होने न सिर्फ उस दौर को आइना दिखाने का क ाम किया है बल्कि, भारतीय सिनेमा को वह बुलंदी दी जिसने आने वाले दौर के फिल्म निर्माताओं के सामने आदर्श का काम किया। पेश है ऐसी ही पांच फिल्मों की झलकियां.....
प्यासा (1957) : यह फिल्म 19 फरवरी 1957 को रिलीज हुई। गुरू दत्त, वहिदा रहमान, माला सिन्हा और जॉनी वॉकर अभिनीत इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक खुद गुरू दत्त ही थे। यह फिल्म एक असफल और मजबूर लेखक की कहानी को बयां करती है।
मदर इंडिया (१९५७) : साहूकार के चंगुल में फंसे एक परिवार की दिल छू लेने वाली इस कहानी को फिल्म के निर्माता-निर्देशक महबूब खान ने खुद ही लिखा था। नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार और राज कु मार अभिनीत यह फिल्म 25 अक्टूबर 1957 को रिलीज की गई।
जागते रहो (१९५६) : गांव से काम की तलाश में गांव से शहर आए एक किसान की मजबूरी और शहर के तथाकथित बड़े लोगों के जीवन के छुपे हुए पहलुओं को उजागर करने वाली इस फिल्म में राज कपूर ने मुख्य भूमिका अदा की थी।

दो बीघा जमीन (१९५३) : एक किसान की दो बीघा जमीन पर साहूकार की बुरी नजर और उसे बचाने के लिए एक गरीब किसान के संघर्ष को बयां करने वाली इस फिल्म की कहानी सलिल चौधरी ने लिखी थी। फिल्म के निर्माता-निर्देशन बिमल रॉय थे जबकि इस फिल्म में बलराजी साहनी, निरूपा राव, जगदीप, मीना कुमारी और रतन कुमार ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं।
नया दौर (१९५७) : आजादी के बाद आए औद्योगीकरण और उससे गरीब खासतौर तांगेवालों के जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाने वाली इस फिल्म में दिलीप कुमार, वैजयंतीमाला और जीवन ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थी। फिल्म का निर्माण और निर्देशन बी आर चोपड़ा ने किया था।

थेअरी

थेअरी म्हणजे थेअरी असते
कधी खोटी कधी खरी असते
तिला शेंडा आणि बूड असते
पण तरीही ते कधीच उमजत नसते
सारे जग हिच्या मागे फसते
कधी हि कोणाला दिसते
आणि कधी हि कोणाला बघून लपते
हि सारखी माझ्या डोळ्यात खुपते
हि थेअरी कशी असते
पण ती कोणालाच समाजात नाही
तिला बघून घाम शिवाय शरीरा मध्ये कोणीच बोलत नाही
तिला स्वतःवर खूप गर्व असते
म्हणून थेअरी म्हणजे थेअरी असते
कधी खोटी कधी खरी असते

इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा


भारत में छद्म बुद्धिजीवियों का एक छोटा-सा वर्ग है, जिसके कुछ नुमाइंदे पत्रकारिता में भी हैं और जो प्राय: आम आदमियों में लोकप्रिय चीजों को हिकारत की निगाह से देखता है। उनकी हिकारत के दायरे में साहित्य, सिनेमा और राजनीति भी शामिल है। ममता बनर्जी तथाकथित भद्रलोक से नहीं हैं, अत: उनकी जबरदस्त चुनावी जीत को भी इत्तफाक ही माना जा रहा है।

पश्चिम बंगाल का शासन ‘राइटर्स बिल्डिंग’ से चलाया जाता है और इसके नाम में भी भद्रलोक ध्वनित होता है। कुछ पाठकों ने यह जानने का आग्रह किया है कि लोकप्रिय फिल्मों की श्रेणी में ‘दबंग’ को शिखर पुरस्कार देने पर क्या प्रतिक्रिया हुई है।

सलमान खान पुरस्कारों के तमाशे में कोई खास रुचि नहीं लेते, अत: वे न अति उत्साहित लगे और न ही खिन्न लगे। उनका कहना है कि देश के दर्शकों ने फिल्म को वर्ष की सबसे सफल फिल्म बनाया और राष्ट्रीय पुरस्कार समिति ने उसी पर अपनी मोहर लगाई है। वह हमेशा आम दर्शकों के पसंदीदा नायक रहे हैं और पूरे वर्ष उनके मकान के बाहर काफी संख्या में प्रशंसक जमा रहते हैं। सलमान की सोच में कोई छद्म बौद्धिक दंभ नहीं है और कभी कोई पूर्वनिर्धारित योजना के तहत वह काम भी नहीं करते। उनका प्रेम निश्छल है और हिकारत में भी कोई मिलावट नहीं है।

बहरहाल ‘दबंग’ मसाला फिल्म है। इसमें कर्णप्रिय संगीत है और ‘मुन्नी बदनाम’ की लोकप्रियता के कारण साजिद-वाजिद के बाकी सारे गानों के माधुर्य को यथोचित सराहना नहीं मिली। इस एक्शन फिल्म की प्रेम-कथा लोगों को बहुत पसंद आई है और सोनाक्षी की ताजगी भी सराही गई है। कथा में सौतेले भाइयों के रिश्ते के साथ पारिवारिकता के तत्वों का समावेश भी है।

ज्ञातव्य है कि ‘नाम’ में सगे भाइयों की जगह सलीम साहब ने सौतेलों के बीच गहरा प्रेम दिखाकर फिल्म को धार प्रदान की थी। यह हिंदुस्तानी सिनेमा के निजी आजमाए हुए फॉमरूले की फिल्म थी जो विगत कुछ वर्षो में ‘डॉलर सिनेमा’ के नीचे दबा दिए गए थे।

इसकी विशुद्ध भारतीयता इसकी ताकत थी, जिस कारण मल्टीप्लैक्स के साथ एकल सिनेमाघरों में भी अभूतपूर्व भीड़ जुटी। कुछ लोगों को भ्रष्ट पुलिस वाले की रॉबिन हुड नुमा छवि पर एतराज है, जबकि रॉबिन हुड का चरित्र हमेशा अवाम को पसंद रहा है। कुछ एतराज संवादों पर है।

कस्बों में इसी तरह की बातें की जाती हैं। ‘मुन्नी’ पर एतराज करने वाले लोग लोकगीतों के खुलेपन को नजरअंदाज कर रहे हैं और दशकों पूर्व ट्विन संगीत कंपनी द्वारा पेश सिपहिया गीतों की उन्हें जानकारी नहीं है। दरअसल सारे एतराज श्रेष्ठिवर्ग और भद्रलोक विचार-शैली से संबंध रखते हैं और इसी वर्ग ने ‘सिलसिला’ के लोकगीत ‘रंग बरसे भीगे..’ का खूब मजा लिया था क्योंकि वह श्रेष्ठिवर्ग की बनाई फिल्म थी और लोग ‘मेरे अंगने में तुम्हारा क्या काम है..’ को भी भूल गए। दरअसल सदियों से इसी जमात ने तो ‘ले लीना दुपट्टा मेरा।’ ये लोग तो कोठों पर भी मुखौटा लगाकर गए हैं।

आम आदमी जीवन के असमान युद्ध में निहत्था ही लड़ता आया है। अन्याय आधारित समाज में उस गरीब के मनोरंजन पर एतराज है और विषम जीवन परिस्थितियों में उसके जरा-सा खुश हो जाने पर कुछ लोगों की भौहों में बल पड़ जाता है। अपने संगमरमरी बुर्जे पर बैठे लोग हैरान हैं कि यह कम्बख्त आम आदमी साला ठहाके कैसे लगा रहा है!

अनाज और सुविधाओं पर कंट्रोल लगा दिया है, इसकी खुशी पर ‘सस्ता’ और अश्लीलता का आरोप जड़ दो, इसके पुरस्कारों को कलंकित कर दो। यह हिकमत अनेक साहित्यकारों के खिलाफ कारगर सिद्ध हुई। चाहे मुनरो हों या मंटो, इस्मत चुगताई हों या डीएच लॉरेंस, राजा रवि वर्मा हों या एमएफ हुसैन।

राष्ट्रीय पुरस्कार चयन समिति के अध्यक्ष जेपी दत्ता ने अधिकारिक घोषणा के समय लोकप्रिय फिल्म श्रेणी की बात के पहले अपना चश्मा उतारा और चेहरे पर भाव परिवर्तन कुछ ऐसा आभास दे रहा था मानो वे कुछ मजबूर होकर ‘दबंग’ की घोषणा कर रहे हैं। यह भी संभव है कि वे स्वाभाविक सहज थे और उनकी अदा का यह अर्थ ही गलत लगाया जा रहा है, परंतु मुमकिन है कि उनके अवचेतन में उनके बुद्धिजीवी प्रशंसक मौजूद हों और यह उन्हें क्षमायाचना सहित निवेदन हो, परंतु अगले दिन अपने बयान में उन्होंने ‘दबंग’ की प्रशंसा ही की।

छोटा-सा प्रभावशाली दल बड़ी झिझक से मन मसोसकर इस बात पर विद्रूप से मुस्कराता है कि उसके मतानुसार किसी ‘बाजारू’ चीज को पुरस्कार भी मिले, क्योंकि सारे राष्ट्रीय पुरस्कार उन फिल्मों के लिए आरक्षित रखे हैं, जिन्हें कम लोगों ने देखा और कमतर ने समझा हो।

Thursday, 26 May 2011

मुझको यारो माफ करना मैं नशे में हूं


मुंबई में यह खबर बहुत चटखारे लेकर सुनी-सुनाई और फैलाई जा रही है कि तमाम सुपर सितारों और सफल फिल्मकारों की पत्नियां अलग-अलग दलों में विभाजित हैं और हर दल में अपने मित्रों और निकट के लोगों के साथ नशीली दवाओं का सीमित मात्रा में उपयोग करती हैं। इसके साथ ही अत्यंत कम प्रचलित तथ्य यह भी है कि सितारा खिलाड़ियों और अत्यंत समृद्ध औद्योगिक घरानों की महिलाएं भी सीमित मात्रा में ड्रग्स का उपयोग करती हैं।

कुछ वर्ष पूर्व एक आकलन यह भी प्रकाशित हुआ था कि विगत दो दशकों में भारतीय समाज में शराब पीने वाली महिलाओं का प्रतिशत काफी हद तक बढ़ा है। पहले केवल जनजातियों की महिलाएं ठर्रा पीती थीं और अब तो निहायत ही निम्न आय वर्ग की महिलाएं भी पीती हैं।

गौरतलब यह है कि मध्यम शिक्षित वर्ग की घरलू कार्य में व्यस्त महिलाएं एवं दफ्तरों में नौकरी करने वाली महिलाएं भी शराब का सेवन करने लगी हैं। इसके साथ ही छोटे शहरों और कस्बों से नजदीक के बड़े शहर में उच्च शिक्षा पाने या नौकरी करने वाली युवा लड़कियां कुकुरमुत्ते की तरह उभर आए प्राइवेट महिला छात्रावासों में भी शराब का सेवन करने लगी हैं।

दरअसल समाज में खुलेपन की लहर 1969-70 से ही प्रारंभ हो चुकी थी, जिस वर्ष यह बात सामने आई कि देश में काला धन जायज धन के लगभग बराबर हो चुका है। उसी दौर में कुछ बोल्ड किस्म की पत्रिकाओं के प्रकाशन के साथ ही प्रतिष्ठित प्रकाशनों में भी किसी न किसी बहाने नारी शरीर प्रदर्शन की तस्वीरें प्रकाशित होने लगी थीं। क्या समाज में पनपे काले धन का सामाजिक जीवन में खुलेपन की लहर से सीधा संबंध है? यह सही नहीं हो सकता क्योंकि जिन देशों में भ्रष्टाचार और उससे जन्मा काला धन अत्यंत कम है, वहां भी जीवन में खुलापन रहा है।

विक्टोरियन मूल्यों का चश्मा कब का तड़क चुका है और पश्चिम में इसको अभिव्यक्ति और जीवन की स्वतंत्रता के साथ जोड़ा गया है। हमारे यहां स्वतंत्रता सीमित और चुनिंदा लोगों को ही उपलब्ध रही है। दरअसल उन्मुक्त जीवन की चाह स्वाभाविक और सार्वभौमिक है।

सारे सामाजिक नियम, पूर्वग्रह, कुंठाएं एवं वर्जनाओं का निर्धारण मनुष्य की आर्थिक स्थिति ही करती रही है। राजिंदर सिंह बेदी का महान उपन्यास ‘एक चादर मैली सी’ जीवनयापन के कारण एक मानवीय रिश्ते में परिवर्तन की कहानी है कि किस तरह एक विधवा को अपने बच्चे समान देवर से विवाह करना पड़ता है क्योंकि सीमित आय में दो परिवारों का गुजारा संभव नहीं है। नैतिकता या उसके नाम पर रची छद्म नैतिकता आर्थिक जरूरतों के सामने अत्यंत लचीली और परिवर्तनशील हो जाती है। नैतिकता का स्थान केवल गरीब आदमी के लिए है और समर्थ के सामने यह मोम हो जाती है।

बहरहाल सितारों की पत्नियों का जीवन सचमुच कष्टप्रद है, क्योंकि पति न केवल व्यस्त है वरन फुर्सत के क्षणों में भी वह चमचों से घिरा रहता है और उसे अपनी प्रशंसा के समूह गीत ही पसंद हैं। वह सत्य का एक सुर भी सहन नहीं कर सकता। अपने जीवन की ऊब को कम करने के लिए नशीले पदार्थ का सेवन शायद किया जाता है और जीवन के यथार्थ से पलायन की इच्छा अनेक लोगों को होती है। ड्रग्स के सेवन से कुछ समय तक व्यक्ति स्वयं ही सुपर सितारा हो जाता है।

Wednesday, 25 May 2011

सेलिब्रिटी फंडा: न्यूड हो जाओ, नाम कमाओ, काम पाओ

बॉलीवुड सेलीब्रिटी लोगों को अपनी और खींचने का एक भी मौका छोड़ना नहीं चाहते। ऐसे में सोशल नेटवर्किग साइट उनके लिए सुर्खियां बटारने का सबसे अच्छा माध्यम बन गई हैं। वे अपने जीवन से जुड़ी हर छोटी से छोटी घटना का उल्लेख साइट पर करते रहते हैं।


हालांकि बालीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन रेगुलर ट्विटर पर पोस्ट करते है, जो बहुत सामान्य बातें होती हैं। लेकिन वहीं कुछ हस्तियां अपने प्रशंसकों की लिस्ट लंबी करने के चक्कर में कई बार न्यूड फोटो लोड कर देते हैं या फिर कुछ ऐसा कर जाते है जो बहुत चौंकाने वाला होता है।

हाल ही में फिल्म प्रिंस में विवके ओबेरॉय के साथ नजर आ चुकी अभिनेत्री अरुणा शील्ड्स ने अपनी चौंकाने वाली तस्वीर फेसबुक पर डाली थी। जिसमें अरुणा चेचक से पीड़ित दिखाई पड़ रही है। इस तस्वीर को अरुणा ने ऐसे ही पोस्ट कर दिया है। जिसमें वह न्यूड दिख रही है। “The sick n spotty prize goes to Miss Measles. . हम अरुणा के जल्द ठीक होने की कामना करते है, लेकिन उनकी इस हरकत ने सब को चौंका दिया है।

ऐसे ही शर्लिन चोपड़ा ने अपनी न्यूड फोटो साइट पर डाली थी। जिसके बाद काफी हंगामा मचा था और इसके बाद ट्विटर ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि तब तक शर्लिन बहुत सुर्खियां बटोर चुकी थी।

मनीषा कोईराला ने भी अपने पति सम्राट से अलग होने की खबर ट्विटर पर ही पोस्ट की थी। मनीषा ने ऐसे करके सबकों चौंका तो दिया, लेकिन जैसे ही उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने उसे साइट से हटा दिया।

दक्षिण के सुपरस्टार कमल हासन ने भी ट्विटर पर लिखा था कि शाहरुख से ज्यादा प्रशंसक तो मेरे है। यह उनका पहला ट्विटर कमेंट था जिसमें उन्होंने लिखा था कि “the real KRK is here’.

इस तरह के उदाहरण और भी है। जो आगे भी शायद जारी रहेंगे।

आपकी राय: आपकों क्या लगता है कि सिर्फ सुर्खियां बटोरने के लिए सितारे ऐसा करता है या फिर इसमें कुछ सच्चाई भी होती है? आपकी राय हमें मर्यादित भाषा में कमेंट बॉक्स में जाकर दे सकते हैं।
http://bollywood.bhaskar.com/article/ENT-BOL-bollywood-social-networking-updates-create-shocking-waves-2131030.html

Tuesday, 24 May 2011

गाय कन्याएं और भारतीय लोग


आमिर खान की इमरान खान अभिनीत फिल्म ‘देल्ही बैली’ में पूर्णा जगन्नाथन नामक भारतीय मूल की अमेरिकी टेलीविजन अभिनेत्री ने नायिका की भूमिका निभाई है। पूर्णा के पिता भारतीय विदेश सेवा में कार्यरत रहे, अत: उन्हें ब्राजील, आयरलैंड, अर्ज्ेटीना, पाकिस्तान इत्यादि देशों में रहने का अनुभव है और अभिनय के साथ ही वह अपनी सलाहकार कंपनी ‘काऊगल्र्स एंड इंडियंस’ भी चलाती हैं।

यह संभव है कि पूर्णा भारत से अधिक समय विदेशों में रही हों, जिसका प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर भी अवश्य पड़ा होगा। उनके द्वारा अपनी कंपनी के नाम चयन से कुछ अनुमान लगाया जा सकता है, जिसका अनुवाद होगा- ‘गाय कन्याएं और भारतीय’।

महानगरों के वाचाल लोग बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के इलाके को हिकारत से काऊ बेल्ट अर्थात गैया क्षेत्र कहते हैं और डॉलर सिनेमा के छोटे से प्रभाव काल में दंभी फिल्मकार भी गाय क्षेत्र के दर्शकों को हिकारत से ही देखते थे, परंतु ‘गजनी’, ‘वांटेड’ और ‘दबंग’ की विराट व्यावसायिक सफलता और उसमें एकल सिनेमाघरों के योगदान से वे चकित और शर्मसार हैं।

दरअसल यह दृष्टिकोण अपनी छद्म आधुनिकता का दंभ है और संघर्षरत उभरते लोगों का अपमान भी है। उन्हें जिस महानगरीय प्रगति का दंभ है, वह कितनी खोखली है, यह जानने के लिए उन्हें चीन के संपूर्णत: विकसित बीजिंग से दूरदराज बसे क्षेत्रों को देखना चाहिए या उसकी जानकारी हासिल करनी चाहिए।

बहरहाल, पूर्णा मुंबइया फिल्म उद्योग की पारंपरिक सितारा नायिकाओं की तरह नहीं हैं। इस उद्योग में कमसिन उम्र की लड़कियां प्रवेश करती हैं, परंतु पूर्णा पूर्णत: वयस्क हैं और वयस्क फिल्म से ही प्रारंभ कर रही हैं। इस क्षेत्र में कम उम्र अधिक पूंजी मानी जाती है, परंतु पूर्णा संभवत: प्रतिभा की पूंजी पर निवेश या कहें कि प्रवेश कर रही हैं।

आमिर खान ने सेंसर बोर्ड के समक्ष वयस्क फिल्म के प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया, जबकि अमूमन फिल्म निर्माता आपत्तियां उठने पर इस तरह का प्रमाण पत्र मजबूरी में स्वीकार करते हैं क्योंकि इनका सैटेलाइट प्रदर्शन देर रात होने के कारण कम धन प्राप्त होता है।

आमिर की फिल्म में सेक्स इत्यादि के दृश्य नहीं हैं, परंतु वयस्क प्रमाण पत्र उन्होंने संवादों में अपशब्दों के इस्तेमाल के कारण मांगा है। आजकल रोजमर्रा के जीवन में अपशब्दों का इस्तेमाल बहुत होता है और गौरतलब यह है कि अंग्रेजी में बोले अपशब्दों पर उतनी आपत्ति नहीं ली जाती, जितनी हिंदुस्तानी भाषा में दी गई गालियों पर ली जाती है।

आजकल भद्रलोक की प्रकाशन संस्थाओं द्वारा प्रकाशित अंग्रेजी भाषा की किताबों में पात्र प्राय: अपशब्द जड़ित भाषा में बात करते हैं। कुछ अंग्रेजी भाषा में लिखी किताबों में प्रचुर मात्रा में हिंदी शब्दों का इस्तेमाल हो रहा है। उसी तरह हिंदी भाषा के अखबारों में न केवल अंग्रेजी के शब्दों का इस्तेमाल होता है, वरन एक या दो पृष्ठ भी अंग्रेजी में होते हैं।

गोयाकि इस अभिव्यक्ति के अधिकतम दौर में भाषाएं गलबहियां करती नजर आ रही हैं और उन्होंने छद्म शास्त्रीयता के कौमार्य को तिलांजलि दे दी है। गौरतलब यह है कि इस कालखंड में अनेक क्षेत्रों में लोग पूर्वनिर्धारित परिभाषाओं से परे जा रहे हैं और कुछ धारणाओं के टांके उधड़ गए हैं, सिलाई की जगह ही नष्ट हो रही है।

यह शरारत और गुदगुदी का दौर है। बहरहाल, ‘देल्ही बैली’ की कथा की जानकारी नहीं है, परंतु फिल्म के नाम के चयन में शायद अनचाहे ही एक व्यंग्य आ गया है। देश की राजधानी का पेट विराट है, दिल और दिमाग से ज्यादा खाने पर जोर है। राष्ट्रीय अपच का द्योतक हो गया है यह टाइटिल।

DRAG ME TO HELL (2009) MOVIE REVIEW

Storyline

Christine Brown is a loans officer at a bank but is worried about her lot in life. She's in competition with a competent colleague for an assistant manager position and isn't too sure about her status with a boyfriend. Worried that her boss will think less of her if she shows weakness, she refuses a time extension on a loan to an old woman, Mrs. Ganush, who now faces foreclosure and the loss of her house. In retaliation, the old woman place a curse on her which, she subsequently learns, will result in her being taken to hell in a few days time. With the help of a psychic, she tries to rid herself of the demon, but faces several hurdles in the attempt.

Review

This is how a Horror Movie should be..Completely Satisfactory

After reading lots of bad reviews in here I went and saw the movie last night.. all that I can say is WOW! Raimi is back..to Horror .. Cant wait for Evil Dead 4... To all the pathetic people that wrote bad reviews .. get a life, Obviously none of them have seen evil dead trilogy or appreciate Sam Raimi's work, this movie had it all. all you haters go watch your favorite SAW movie and be gone! Great sound, Great fx and wow PG13 lol. But Ill tell you this, If your wanting to go see the best horror movie made in years this is the one. But if your expecting Saw like gore. This is not your movie. Raimi doesn't need blood splatter in this one to shock. 

Directed by
Sam Raimi 
 
Writing credits
(WGA)
Sam Raimi (written by) &
Ivan Raimi (written by)

Cast

Alison Lohman Alison Lohman ...
Justin Long Justin Long ...
Lorna Raver Lorna Raver ...
Dileep Rao Dileep Rao ...
David Paymer David Paymer ...
Adriana Barraza Adriana Barraza ...
Chelcie Ross Chelcie Ross ...
Reggie Lee Reggie Lee ...
Molly Cheek Molly Cheek ...
Bojana Novakovic Bojana Novakovic ...
Kevin Foster Kevin Foster ...
Alexis Cruz Alexis Cruz ...
Ruth Livier Ruth Livier ...
Shiloh Selassie Shiloh Selassie ...
Flor de Maria Chahua Flor de Maria Chahua ...