Friday, 13 May 2011

पूरी दुनिया में सिर्फ दो लोग बोलते हैं ये 'रहस्यमयी' भाषा


दुनिया में करीब 6000 भाषाएं आज बोली जाती हैं। इनमें से आधी अगली एक सदी में विलुप्त हो जाएंगी। इसका सबसे बड़ा खतरा अयापैनेको भाषा के सामने है। फिलहाल मैक्सिको के मेनुएल सेगोविआ और इस्रिडो वेलाज़कुएज्टो, सिर्फ दो ही आदमी दुनिया में इस भाषा के जानकार बचे हैं। दोनों आधे घंटे की दूरी पर बसे गांवों में रहते हैं।

इंडिआना यूनिवर्सिटी के लिंग्विस्टिक एंथ्रोपोलॉजिस्ट डेनियल सुस्लैक कहते हैं कि वहां स्पेनिश भाषा अनिवार्य होने का खामियाजा इस भाषा को भुगतना पड़ा है। अफसोस की बात है कि सेगोविआ और वैलाकुएज भी घर से निकलना पसंद नहीं करते, इसलिए इस भाषा को बचाने के प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं।

हीरोइन के ड्रीम रोल में ऐश

मधुर भंडारकर की फिल्म ‘हीरोइन’ (नायिका) अब ऐश्वर्या राय बच्चन अभिनीत करने जा रही हैं। मधुर इसे करीना कपूर के साथ बनाना चाहते थे, परंतु चारों खान सितारों के साथ फिल्मों के कारण करीना मधुर की फिल्म के लिए समय नहीं निकाल पा रही थीं। ऐश्वर्या राय को पटकथा इतनी पसंद आई कि उन्होंने संजय दत्त की ‘सत्ते पे सत्ता’ नामक फिल्म को कुछ समय के लिए टाल दिया है।

कहा जा रहा है कि मधुर की फिल्म हॉलीवुड अभिनेत्री मर्लिन मुनरो के जीवन से प्रेरित है और उन्होंने उनके जीवन की गुत्थियों का भारतीयकरण किया है। एक फिल्म सितारे के जीवन पर श्याम बेनेगल स्मिता पाटिल अभिनीत ‘भूमिका’ फिल्म बना चुके हैं। एक सफल फिल्म नायिका का जीवन एक त्रासद फिल्म की संभावना लिए होता है। आजकल एकता कपूर के लिए निर्देशक मिलन लूथरिया दक्षिण की सेक्स सिंबल रही सिल्क स्मिता के जीवन और आत्महत्या पर आधारित फिल्म विद्या बालन के साथ बना रहे हैं। प्रचारित सेक्सी सितारों का जीवन बुद्धिजीवियों को भी आकर्षित करता रहा है। ब्रिजिट बारडोट के विफल आत्महत्या प्रयास पर सिमोन द बोउवा जैसी लेखिका ने लिखा है।

मर्लिन मुनरो, मीना कुमारी, माइकल जैक्सन इत्यादि तमाम सफल और संतृप्त लोगों में एक समानता तो यह है कि उनका बचपन अत्यंत त्रासद अभावों और असुरक्षा से भरा रहा और जीवन भर वे लोग खोए हुए बचपन को तलाशते रहे। दूसरी समानता इनकी प्रेम की तलाश है। अनगिनत लंपट लोगों की टपकती लार और इच्छाओं के घोड़ों के बेलाग सरपट भागते रेलों के बीच एक बूंद सच्चे प्यार के लिए ताउम्र तड़पते रहते हैं ये लोग। इनके द्वारा गढ़ी गई मादक छवियां न केवल इनके प्रशंसकों को भरमाती हैं, वरन ये भी उन्हीं से ठगे जाते हैं।

बहरहाल, छत्तीस वर्ष की उम्र में ५ अगस्त 1962 को मर्लिन अपने शयनकक्ष में मृत पाई गईं और नींद की गोलियों के अधिक खा लेने से इसे आत्महत्या भी माना गया, परंतु पोस्टमार्टम में उनके शरीर में जहर पाया गया। 1973 में प्रकाशित नॉर्मन मेलर की किताब ‘मर्लिन’ में शंका जताई गई है कि वह आत्महत्या नहीं वरन राजनीतिक हत्या थी क्योंकि मर्लिन और रॉबर्ट कैनेडी के बीच प्रेम प्रसंग चल रहा था और अमेरिका के विवाहित एटॉर्नी जनरल की लुकी-छिपी प्रेमकथा का उजागर होना राजनीतिक विवाद खड़ा कर सकता था। भला किसी ‘नचनिया’ के लिए राजनीति के श्रेष्ठि परिवार पर आंच आ सकती है?

ज्ञातव्य है कि 1961 में जॉन एफ कैनेडी के जन्मदिन के अवसर पर न्यूयॉर्क के मेडिसन स्क्वायर गार्डन में आयोजित भव्य समारोह में मर्लिन ने भाग लिया था और ‘हैप्पी बर्थ-डे’ गाया था। मर्लिन ताउम्र अपनी मादक छवि से लड़ती रहीं और स्वयं को बेहतर अभिनेत्री साबित करने का प्रयास करती रहीं। 1950 में उनकी पहली बड़ी फिल्म ‘द एस्फाल्ट जंगल’ थी और 1961 में अंतिम फिल्म ‘द मिसफिट्स’ थी। एक तरह से वह लोकप्रियता के जंगल में स्वयं को अजनबी ही पाती रहीं।

मधुर भंडारकर ने ‘पेज ३’, ‘कारपोरेट’ और ‘फैशन’ जैसी फिल्में बखूबी बनाई थीं और वह संभ्रांत समाज की सतह के नीचे प्रवाहित गंदगी को पकड़ने में समर्थ रहे हैं। एक मादक शरीर वाली महिला सितारे के जीवन के बहाने वह मनोरंजन उद्योग की चमक के परे छाए हुए अंधेरे को प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐश्वर्या राय बच्चन भी प्रारंभ से ही अपने सौंदर्य के परे अपनी अभिनय क्षमता दिखाने को बेताब रही हैं। यह उनके लिए अच्छा अवसर है। मादकता और अंतरंगता के दृश्य उनके लिए कठिन होंगे, परंतु अपनी आंखों के इस्तेमाल से भी भड़कती इच्छाओं का प्रस्तुतीकरण हो सकता है।

अपराध नहीं अपराध फिल्में कमाती हैं


एकता कपूर की अजय देवगन और इमरान हाशमी अभिनीत फिल्म ‘वंस अपॉन ए टाइम इन मुंबई’ कथित तौर पर हाजी मस्तान और दाऊद इब्राहिम के जीवन से प्रेरित है। हालांकि अदालत ने हाजी मस्तान के परिवार के दावे को निरस्त कर दिया है। मीडिया के तंदूर से इस फिल्म के बारे में अनेक गरम-गरम खबरें आ रही हैं।

यह भी एक लोकप्रिय प्रचारित बात रही है कि सलीम-जावेद की लिखी ‘दीवार’ भी हाजी मस्तान से प्रेरित थी। सच्चई यह है कि सलीम-जावेद ने ‘मदर इंडिया’ से मां के पात्र को लिया और दिलीप कुमार की ‘गंगा जमना’ से दो भाइयों के चरित्र लिए और ग्रामीण परिवेश के इन पात्रांे को महानगर में स्थापित किया। लेखकों पर मार्लिन ब्रांडों अभिनीत ‘वॉटरफ्रंट’ का भी गहरा प्रभाव है। इसी कारण नायक डॉक पर काम करने वाला व्यक्ति है।

जिन दिनों ‘दीवार’ का प्रदर्शन हुआ, उन दिनों अपराध सरगना हाजी मस्तान का बहुत दबदबा था। अत: फिल्म के साथ उनका नाम भी जोड़ दिया गया, जबकि सचमुच ऐसा नहीं था। ज्ञातव्य है कि मारियो पूजो और फ्रांसिस फोर्ड कपोला की ‘गॉडफादर’ को भी संगठित अपराध की विश्वसनीय प्रस्तुति करने वाली फिल्म माना जाता है, जबकि फिल्म की सफलता के बाद अमेरिका के अपराधी ‘गॉडफादर’ के पात्रों की तरह कपड़े पहनने लगे और बातचीत तथा व्यवहार में भी नकल करने लगे।

हमारे यहां भी ‘शोले’ की विराट सफलता के बाद डाकुओं ने न केवल जींस पहनना शुरू किया, वरन भाषा और शैली में भी गब्बर सिंह की नकल करने लगे। इतना ही नहीं उत्तरप्रदेश और बिहार के कुछ नेताओं ने भी गब्बर के अंदाजे बयां को रिहर्सल करके अपना लिया। गब्बर के संवाद भारतीय जनजीवन की भाष का हिस्सा बन गए- जो डर गया वो मर गया, अरे ओ सांबा कितने आदमी थे, इत्यादि।

कमसिन उम्र में फिल्में दिलोदिमाग पर छाई रहती हैं।

जब इसी तरह का आदमी अपराध सरगना हो जाता है, तो अपनी ‘ताकत’ का इस्तेमाल करके अपने प्रिय सितारे से मिलता है। ‘डी’ कंपनी के दबदबे के दौर में अनेक सितारों को दुबई जाकर अपराध सरगना से मिलना पड़ा और कुछ ने उनकी महफिल में ‘मुजरा’ तक कर डाला। उनके इशारों पर पूंजी निवेशकों ने फिल्म में धन भी लगाया। अपराध सरगना ने कभी स्वयं अपना धन नहीं लगाया, क्योंकि पूंजी निवेश नहीं, वरन मुनाफे में हिस्सेदारी लेना उन्हें पसंद है।

एक तुकबंदी करने वाले सरगना ने कुछ फिल्मी गीत भी लिख डाले। संगठित अपराध और मुंबइया फिल्म उद्योग के नजदीकी ‘रिश्तों’ की बात असत्य है। उनका रिश्ता तो नेताओं से ज्यादा नजदीकी का रहा है, जिनके प्रश्रय के कारण वे पनपे। सच तो यह है कि संगठित अपराधी आम जनता से हफ्ता वसूल करते हैं और नेता को उनका हिस्सा भेजते हैं। अभिनेता-सरगना के बीच का रिश्ता डर का है और सरगना तथा नेता लूट के भागीदार हैं।

उस दौर में हाजी मस्तान की प्रेमिका सोना नाम की जूनियर कलाकार थी, जिसकी शक्ल मधुबाला से बहुत मिलती थी, परंतु अबू सलेम और मोनिका बेदी की तरह उनके संबंधों का भौंडा प्रदर्शन नहीं हुआ। दाऊद और मंदाकिनी का इश्क भी प्रचारित है। संगठित अपराध के लोग फिल्मी ग्लैमर से प्रभावित रहे हैं और फिल्मी प्रेमिका उनके लिए स्टेटस सिंबल रही हैं। फिल्में अपराधियों के बचपन का कुटैव रही हैं। अत: अपने जीवन से प्रेरित फिल्मों से वे गौरव महसूस करते हैं और बकौल फ्रांसिस फोर्ड कपोला के अनचाहे ही अपराध फिल्में उन्हें महिमामंडित भी करती हैं।

शाहरुख खान की चिंता और सुरक्षा

शाहरुख खान अपनी अत्यंत बड़े बजट में बनाई गई फिल्म ‘रा. वन’ की सफलता को लेकर चिंतित हैं और उन्होंने अपनी पत्नी गौरी से पूछा कि अगर जबरदस्त घाटा हुआ तो क्या होगा। गौरी ने कहा कि विगत बीस वर्र्षो में इस उद्योग से उन्हें बहुत कुछ मिला है और इस फिल्म में बहुत कुछ डूबा भी तो क्या फर्क पड़ता है। दरअसल गौरी का आशय था कि ‘रा.वन’ की तरह तकनीकी तौर पर श्रेष्ठतम रचने के सृजन सुख के सामने पैसा क्या चीज है।

दरअसल चिंता शाहरुख का स्वभाव हो सकता है, जबकि वह जानते हैं कि उसकी असफल फिल्में भी सैटेलाइट अधिकार मिलाकर लगभग अस्सी करोड़ का व्यवसाय करती हैं और दिवाली प्रदर्शन का बोनस जोड़कर यह आंकड़ा सौ करोड़ तक हो सकता है। वह किस काल्पनिक घाटे की कौन-सी चिंता कर रहे हैं? एक सितारे की ताकत उसकी सफल फिल्म पर नहीं, वरन असफल फिल्म कितनी लागत लौटा पाती है, इस पर निर्भर करती है। बाजार में खबर है कि ‘रा.वन’ के सैटेलाइट अधिकार चालीस करोड़ रुपए में बिके हैं।

यह अजीब दौर है, जब असफल फिल्म बनाने वाले की जेब से कुछ नहीं जाता। वह दौर गया, जब गुरुदत्त को ‘कागज के फूल’ और राज कपूर को ‘मेरा नाम जोकर’ के घाटे की भरपाई के लिए सब कुछ गंवाना पड़ा था। इससे भी अजीब बात यह है कि आज सितारा निर्माता बॉक्स ऑफिस की चिंता में रतजगे कर रहा है या रतजगे की बात कर रहा है, परंतु उसकी सिनेमाई गुणवत्ता और समाज के संदर्भ में उसके स्थान को लेकर चिंता नहीं है।

शाहरुख खान ने यह भी कहा है कि आदित्य चोपड़ा ने ‘एक था टाइगर’ नामक जो फिल्म सलमान खान को दी है, वह पहले उन्हें दी जा रही थी, परंतु समयाभाव के कारण वह नहीं कर पाए। सलमान ने यह कभी नहीं कहा कि ‘चक दे इंडिया’ उनके द्वारा अस्वीकृत करने के बाद शाहरुख के पास गई थी। पैंतालीस वर्षीय शाहरुख खान को यह बचपना शोभा नहीं देता, परंतु वे जानकर टाइगर खान को छेड़ रहे हैं।

सितारों की यह आपसी चुहलबाजी केवल मीडिया के लिए रची जाती है और वे चटखारे लेकर इसे प्रकाशित करते हैं। शाहरुख के अन्यतम मित्र करण जौहर भी सलमान को लेकर फिल्म की योजना बना रहे हैं। सच तो यह है कि आज हर सुपर सितारे के साथ बनाई जा रही फिल्म में हिट या फ्लॉप होने के मारे मात्र प्रदर्शन कर देने पर करोड़ों का मुनाफा है। दबंग लहर में हर समर्थ निर्माता लाभ कमाना चाहता है और मुनाफा फिल्म उद्योग की गुटबाजी की सरहदों के पार जाता है। सिनेमा का केंद्र अन्य सभी व्यवसायों की तरह केवल मुनाफा ही रह गया है।

जीवन के हर क्षेत्र में आइपीएल ट्वेंटी ही चल रहा है। ताबड़तोड़ सनसनी रचो और बाजार को लूट लो। आज युवा वर्ग की क्रिकेट में रुचि हो या न हो, परंतु जीवन में ताबड़तोड़ 20-20 ही खेल रहा है। शास्त्रीयता के प्रति किसी को कोई आग्रह नहीं। शाहरुख खान का बड़बोलापन उनका गर्व नहीं है, यह उनका सुरक्षा कवच है। ‘आई एम द बेस्ट’ का नशा ही उनसे अठारह घंटे प्रतिदिन काम करा रहा है और काम में इस तरह डूबे रहने में ही उनकी सुरक्षा है। लोकप्रियता के घोड़े की सवारी कठिन होती है। हर आदमी अपनी पसंद की जीन कसता है, सहूलियत की एड़ी घोड़े की पसलियों में मारता है।

Wednesday, 11 May 2011

3 DEEWAREIN (2003) MOVIE REVIEW

Review
A movie script which makes the hollywood jealous


 The first time i heard about the movie , my reaction was i have to see this one. coming from one of my favourite directors Nagesh Kukuonoor and performers like Naseereruddin Shah.

When i actually got down to see the movie , my feelings were mixed. The performances in the movie were just astounding , the direction was just superb ! but the only downer half way down the movie was i kept having deja vu of having watched the scenes in "Shawshank Redpemption" . The movie did not have the impact till it reached the climax scenes. It was then i realized that the movie was not at all what i expected it to be. And this my friends is a rare find in indian movies. I guess you all must agree with me on this particular point. After the climax was over all i could do was sit dumbfound. I was speechless. This movie that played before me was the best movie of this genre made by an indian in india. It was way better than shawshank redemption in many asepects. (although i am not her undermining the movie in any form , who can ever forget the narration by morgan freeman in that movie).

The direction needs applause by us all. The flashback type concept was great. The first scene when Chandrika (Juhi) meets the 3 convicts was unbelievable . (in the sense that this was actually directed by an indian director) . The contrast of the 3 characters that was potrayed by Nagesh in that scenario was overwhelming. The movie gives the viewer subtle hints throughtout which one realises once the climax scene was over. The best part of the movie was that each one of the dialogue was well built in to the plot of the movie. Starting from the "Aapko pehle kabhi dekha hai" to every other statment.

I think i do not need to comment on performance by Nasseeruddin Shah. He is just amazing. One of the best actors the Indian cinema has seen ever. He is complemented perfectly by Juhi, Nagesh , Gulshan and Jackie. The serious role of Jackie was just too good and he stood up to the role beautifully. Nagesh also played his character true to life.

In all , i would sign off by saying, that if you are one of the people who appreciate movies like shawshank redemption , fight club, memento then DO NOT MISS ON THIS ONE. I would rate the movie better than the afore mentioned 3 movies, and to be honest i loved them all. But if you are the kind who likes masala movies and do not want to appreciate the direction of the movie then this one is not for you. 

Directed by
Nagesh Kukunoor 
 
Writing credits
Nagesh Kukunoor  written by

Cast 
Naseeruddin Shah ... Ishaan Mirza
Jackie Shroff ... Jaggu (Jagdish Prasad)
Juhi Chawla ... Chandrika
Nagesh Kukunoor ... Naagya
Gulshan Grover ... Mohan Kumar
Suresh Gera ... Doctor
Elahe Hiptoola ... Smriti Prasad
Vikram Inamdar

Ayesha Jalil ... Nagya's Mom
Aditya Lakhia

Sujata Mehta ... Jaggu's Wife
Sanjay Sharma ... Ishaan's Lawyer
Shri Vallabh Vyas ... Chandrika's husband

Produced by
Elahe Hiptoola .... executive producer
Sanjay Sharma .... executive producer: Metalight Productions
 
Original Music by
Salim Merchant  (as Salim)
Suleiman Merchant  (as Sulaiman)
 
Cinematography by
Ajayan Vincent 
 
Film Editing by
Sanjib Datta 

हॉलीवुड थ्रिलरनुमा ओसामा खात्मा

सलीम साहब से मुझे मौलाना अबुल कलाम आजाद का अप्रैल १९४६ में शोरिष कश्मीरी को उर्दू पत्रिका ‘चट्टान’ के लिए दिया साक्षात्कार मिला, जो ‘चट्टान’ के अतिरिक्त केवल एक बार पत्रकार द्वारा लिखी किताब में उपलब्ध था। आज पैंसठ वर्ष बाद भी आजाद साहब की प्रतिभा और दूरदृष्टि का अनुमान होता है और उनके आदर में नतमस्तक होना पड़ता है।

आज इतनी पुरानी बात का जिक्र करना इसलिए जरूरी है कि पाकिस्तान के मौजूदा विघटन की कल्पना उस समय ही आजाद ने कर ली थी। आज भारत में अनेक लोग ओसामा बिन लादेन की तरह दाऊद पर आक्रमण की सलाह दे रहे हैं और विज्ञान फंतासी की पटकथा की तरह इसे शॉट-दर-शॉट बताने वालों की कमी नहीं है। इन पाकिस्तानी विरोधियों को चाणक्य नीति का भी स्मरण कराएं तो कहना होगा विघटन की कगार पर पाकिस्तान पर किया आक्रमण उसे पुन: एकता के सूत्र में बांध देगा क्योंकि हर देश अपने अंतर्विरोध उस समय भुला देता है, जब बाहरी आक्रमण होता है। गांधीजी के परम अनुयायी मौलाना आजाद सच्चे मुसलमान थे और उनका कहना था कि विभाजन कभी भी हिंदू-मुस्लिम तनाव को कम नहीं कर सकता और पाकिस्तान का जन्म कोई निदान नहीं, वरन समस्याओं को जन्म देगा। विभाजन की राजनीति कुरान के अर्थ और प्रचार दोनों को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाएगी। धर्म के नाम पर ही धर्म को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया जाता है।

मौलाना साहब को जिन्ना का साथ देने वाले उलेमाओं पर कोई ऐतबार नहीं था। उनका विश्वास था कि तेरह सौ वर्ष के इस्लाम के इतिहास में अधिकतम उलेमाओं ने इस्लाम की सच्ची भावना को नुकसान ही पहुंचाया है। राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित उलेमा इस्लाम का भला नहीं कर सकते। मौलाना साहब ने कहा था कि पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली लोग कभी भी बाहरी व्यक्तियों के नेतृत्व को लंबे समय तक सहन नहीं कर सकते और वे स्वतंत्र होकर रहेंगे। यह कल्पना १९४६ में करना मामूली बात नहीं थी। उन्होंने उस समय ही कहा था कि अरब देशों में एक भाषा और एक मजहब होते हुए भी मतभेद हैं क्योंकि मजहब के नाम पर राजनीतिक एकता लंबे समय तक नहीं टिकती।

आज ओसामा प्रकरण के बाद अरब देशों में गणतंत्र व्यवस्था के प्रति आग्रह और आंदोलन थमने की संभावना से इनकार नहीं कर सकते। अमेरिका के इस कदम में निहित अर्थ और संभावनाएं बहुत गहरी और अनेक सतहों वाली हैं। अमेरिका गणतंत्र व्यवस्था में यकीन का प्रतीक है और इस साख को धर्मांध लोगों के बीच धक्का पहुंच सकता है।

मौलाना साहब को यकीन था कि मजहब के नाम पर बनाए जा रहे पाकिस्तान में निहित स्वार्थ केवल धन बटोरने की स्वतंत्रता चाहते हैं और मौलाना साहब ने इन खतरों को रेखांकित किया था - अयोग्य अपरिपक्व राजनेता फौजी तानाशाही का पथ प्रशस्त करेंगे, विदेशी कर्जों का भार समझौते कराएगा, पड़ोसी देशों से दोस्ताना संबंध नहीं रहेंगे, क्षेत्रवाद पनपेगा, राष्ट्रीय संपदा की लूट होगी, चुनिंदा अमीरों की एकतरफा प्रगति से वर्ग संघर्ष को जन्म मिलेगा। बकौल मौलाना साहब जिन्ना 1906 से 1938 तक हिंदू-मुस्लिम एकता और कांग्रेस में यकीन करते थे। सात प्रांतों में होमरूल चुनावों के समय घिनौना प्रचार हुआ कि एक व्यक्ति एकमत के तहत हिंदुओं की सरकारें बनेंगी - इस गलत प्रचार से प्रभावित जिन्ना पूरी तरह बदले।

बहरहाल आज पाकिस्तानी होना अपमान की बात हो गया है कि कोई विदेशी उनकी जमीन पर आतंकवादी को मारे और आतंकवादी वहां अड्डा जमाएं। आज इस अपमान से वहां आत्मघाती प्रवृत्तियां पनप सकती हैं और आणविक शस्त्रों से संपन्न देश में संतुलन होना पूरी दुनिया की शांति के लिए आवश्यक है। अमेरिका चौकन्ना है और अब भारत को पहले से कहीं अधिक जागरूक रहना है। चीन के संदिग्ध इरादे और महत्वाकांक्षा देखते हुए हमारे पास अमेरिका से मित्रता बढ़ाने के अतिरिक्त कोई विकल्प भी नहीं है।

अमेरिका में 9/11 को ट्विन टावर्स का ध्वस्त होना और ओसामा को 40 मिनट में मार गिराना दोनों ही घटनाएं हॉलीवुड की फिल्मों की तरह लगती हैं। टेक्नोलॉजी हर अफसाने को हकीकत में बदल सकती है। हमारे फिल्म उद्योग को हॉलीवुड से थ्रिलर बनाना सीखना चाहिए। हम ओसामा खात्मे की तरह दाऊद खात्मा नहीं रच सकते। याद रहे, हर समय अमेरिका के सैकड़ों फौजी और विमान पाकिस्तान में मौजूद रहते हैं।

SALAAM BOMBAY! (1988) MOVIE REVIEW

Storyline

The story of Krishna, Manju, Chillum and the other children on the streets of Bombay. Sometimes they can get a temporary job sellng tea, but mostly they have to beg for money and keep out of the way of the police.

Review
A heart wrenching and very realistic drama.

I have come across one of the most realistic and moving films I have ever seen. Having been involved in helping street kids in India I was pleased to come across this film which so accurately depicts life, love and death around a group of street boys in Bombay.

SALAAM BOMBAY is the story of a 12-year-old street boy surviving and etching out an existence on the squalled streets of Bombay. The interactions these kids have with each other made me feel I was watching a doco. The kids in India are so much like Chipau and the others depicted in Salaam Bombay its amazing. They all have there individual lives and dreams like us all but are burdened with extreame poverty.

The story lines in the film are about the prostitution business, drug addiction and homeless children. All these elements combine so as we see the people and lives behind them. These issues are rarely dealt with on such a personal and emotional level as we see in this film. This ain't Hollywood and it sure ain't Bollywood.

For me my favorite all time film. You may have difficulty in finding this film at your local video library but it truly is worth viewing.

Recently showed this film to a group of street kids in Pune, India. They were amazed at its realism. All thought they were watching real people not actors,(These kids have grown up watching Bollywood films). This same group would have watched this film 5 times now. And all could identify with the characters.

Directed by
Mira Nair
Writing credits
(in alphabetical order)
Mira Nairstory
Sooni Taraporevalascreenplay
Sooni Taraporevalastory

Cast

Cast overview, first billed only:
Shafiq Syed Shafiq Syed ...
Krishna / Chaipau
Hansa Vithal Hansa Vithal ...
Manju Golub
Chanda Sharma Chanda Sharma ...
Sola Saal
Raghuvir Yadav Raghuvir Yadav ...
Chillum (as Raghubir Yadav)
Anita Kanwar Anita Kanwar ...
Rekha Golub (as Aneeta Kanwar)
Nana Patekar Nana Patekar ...
Baba Golub
Anjaan Anjaan ...
Child at the circus
Amrit Patel Amrit Patel ...
Circus Boss
Murari Sharma Murari Sharma ...
Ticket Seller
Ram Moorti Ram Moorti ...
Mad Man
Sarfuddin Qureshi Sarfuddin Qureshi ...
Koyla (as Sarfuddin Quarassi)
Raju Barnad Raju Barnad ...
Keera
Irshad Hashmi Irshad Hashmi ...
Chacha
Mohanraj Babu Mohanraj Babu ...
Salim
Chandrashekhar Naidu Chandrashekhar Naidu ...
Chungal