Sunday, 12 June 2011

कानों से देख लेते हैं डेनियल किश

Source: भास्कर न्यूज नेट
कैलिफोर्निया 43 साल के डेनियल किश पूरी तरह नेत्रहीन हैं। जब वे 13 महीने के थे, तब रेटिनोब्लास्टोमा नामक बीमारी के कारण उनकी आंखें निकाल ली गई थीं। बावजूद इसके किश साइकिल चलाने से लेकर वे तमाम काम कर लेते हैं, जो दृष्टिहीनों के लिए असंभव माने जाते हैं। दरअसल, वे डॉल्फिन और चमगादड़ों की तरह प्रतिध्वनि की तकनीक का प्रयोग करते हैं।

वे अपने मुंह से टिकटिकटिक जैसी आवाज निकालते हैं, जो इमारत, कुर्सी, पेड़ या किसी भी अन्य चीज से टकराकर वापस लौटती हैं, तो उनके मस्तिष्क में पूरा दृश्य बन जाता है। यह तकनीक ‘इकोलोकेशन’ कहलाती है। पेशे से मनोवैज्ञानिक, डेनियल की इस क्षमता के बारे में हाल में यूनि. ऑफ वेस्टर्न ओंटारियो के शोधकर्ताओं ने जांच की और वे यह जानकर हैरान रह गए, जब डेनियल प्रतिध्वनि को सुनते हैं, तो उनके मस्तिष्क में श्रवण की बजाय दृष्टि से संबंधित हिस्सा सक्रिय रहता है। दूसरे शब्दों में, वे कानों से बखूबी ‘देखते’ हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, मस्तिष्क की इस अद्भुत गतिविधि का कारण फिलहाल अज्ञात है, लेकिन डेनियल का मानना है कि हर दृष्टिहीन इस तकनीक का प्रयोग कर दुनिया देख सकता है।

‘वर्ल्ड एक्सेस फॉर द ब्लाइंड’ नामक समाजसेवी संस्था के अध्यक्ष के तौर पर वे प्रशिक्षण देने के लिए काफी देशों में जा चुके हैं। मई 2008 में भारत भी आए थे और कोलकाता में वर्कशॉप में दृष्टिहीनों को इसका प्रशिक्षण दिया था। इकोलोकेशन तकनीक विदेशी दृष्टिबाधितों, खासतौर पर ब्रिटिश लोगों के बीच काफी प्रचलित है।

घायल मन का पागल पंछी उड़ने को बेकरार..


बारह अप्रैल 1973 को बलराज साहनी ने एमएस सथ्यू की फिल्म ‘गर्म हवा’ के संवाद डब किए और तेरह अप्रैल को हृदयगति रुकने से साठ वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई। फिल्म की कहानी विभाजन की त्रासदी को प्रस्तुत करती है- ‘आगरा में एक मुस्लिम परिवार का जूता बनाने का कारखाना है, दो भाइयों का अच्छा-खासा खाता-पीता परिवार है।

एक विवाद की तैयारी चल रही है और विभाजन के भयावह साये पूरे शहर पर छा जाते हैं। शादी की शहनाई मातम के सुर में रोने लगती है। छोटा भाई अपने परिवार के साथ पाकिस्तान पलायन का निर्णय लेता है। देश के साथ अनेक परिवारों में विभाजन होने लगता है। हालात बड़े भाई को भी पाकिस्तान की ओर ढकेलते हैं।

तांगे पर सामान लद गया है और मुखिया फैसले करते हैं कि लाख जद्दोजहद हो, हम अपनी माटी नहीं छोड़ेंगे।’ बलराज साहनी रावलपिंडी में जन्मे थे। अंग्रेजी साहित्य में एमए किया था, कुछ समय हार्वर्ड व शांति निकेतन में रहे थे। गांधीजी के साथ आंदोलन में भाग लिया था। उनके लिए ‘गर्म हवा’ में काम करना निजी अनुभवों की जुगाली की तरह था। उन्होंने परिवार के मुखिया की भूमिका में वही दर्द पेश किया, जो उनके विचार से विभाजन पर महात्मा गांधी ने महसूस किया होगा।

शायद इस महान प्रयास के बाद इच्छा शक्ति ही समाप्त हो गई और उन्होंने किसी नाथूराम गोडसे का इंतजार नहीं किया। बलराज साहनी ने सैंतीस साल की उम्र में फिल्म जगत में कदम रखा। वह निहायत ही खूबसूरत दिलीप, राज और देव आनंद का दौर था। इप्टा में नाटक करते हुए वे फिल्मों में आए। 1951 में गुरुदत्त के लिए ‘बाजी’ लिखी, अब्बास की ‘धरती के लाल’ में काम किया, पर ख्याति मिली बिमल राय की ‘दो बीघा जमीन’ और ‘काबुलीवाला’ से।

‘हम लोग’ नामक फिल्म के लिए उन्हें जेल से स्टूडियो लाया जाता था, क्योंकि कम्युनिस्ट होने के नाते वे कुछ समय राजनीतिक बंदी रहे। ‘गर्म कोट’ उनकी महान फिल्म थी। नूतन के साथ ‘सीमा’ में वे एक महिला सुधारगृह संचालक की भूमिका में सराहे गए थे। ‘सीमा’ फिल्म का यह गीत ही बलराज का परिचय है- ‘घायल मन का पागल पंछी उड़ने को बेकरार, पंख हैं कोमल आंख हैं धुंधली जाना है सागर पार’। - प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक और आलोचक

मैडम तुसाद और करीना कपूर


जून के तीसरे सप्ताह में करीना कपूर की मोम की मूर्ति अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त मैडम तुसाद के म्यूजियम में स्थापित की जाने वाली है, जहां अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, सलमान खान और ऐश्वर्या राय की मूर्तियां पहले से मौजूद हैं। देश-विदेश के अनेक पर्यटक टिकट खरीदकर इस म्यूजियम में जाते हैं, जहां अनेक नेताओं व कलाकारों की मूर्तियां लगी हैं। क्या पर्यटकों के जाने के बाद रात के सन्नाटे में ये मूर्तियां बतियाती होंगी? विंस्टन चर्चिल की मूर्ति ‘अधनंगे फकीर गांधी’ की मूर्ति से क्या कहती होगी या ऐश्वर्या राय और सलमान खान अपने तूफानी प्यार के दिनों के बारे में क्या बतियाते होंगे?

मैरी ग्रोसहोल्ट्ज जर्मन मूल की फ्रांस में बसी महिला थीं, जिनके चाचा मोम की मूर्तियां बनाते थे और बचपन से ही मैरी ने यह विद्या सीखी। चेहरे के भावों को भी कुशलता से वे मोम की मूर्तियों में कुछ ऐसा उभारती थीं कि लगता था ये बतियाने लगेंगी। मैरी बचपन से ही अपने पड़ोसी एवं विज्ञान शोधकर्ता हैनरी से प्यार करती थीं, परंतु फ्रांस में क्रांति के प्रारंभिक दौर में ही आगामी खतरों का अनुमान लगाने वाले हैनरी मैरी से विवाह कर लंदन जाना चाहते थे, परंतु मैरी अपने परिवार और म्यूजियम को छोड़कर नहीं जाना चाहती थीं और बाद में उन्होंने तुसाद नामक आदतन जुआरी से विवाह किया और उसकी गैरजवाबदारी के कारण उसे छोड़ भी दिया। अनेक वर्ष पश्चात वे लंदन जा पाईं और हैनरी से उनका मिलन हुआ। फ्रांस की क्रांति की पृष्ठभूमि में इस अद्भुत प्रेमकथा को मिचेल मोरान ने ‘मैडम तुसाद’ नामक किताब में लिखा है।

मैरी के प्रयास से फ्रांस की रानी मैरी एन्टोनिरे ने अपने पति और परिवार के साथ उनके म्यूजियम की यात्रा की और प्रशंसा की, जिसके नतीजतन म्यूजियम अत्यंत लोकप्रिय हुआ। राजा की बहन एलिजाबेथ को मोम की मूर्तियां बनाना तुसाद ने सिखाया।

क्रांति के समय राज परिवार से निकटता के बावजूद इस परिवार को मारा नहीं गया, क्योंकि क्रांति के अनेक कर्णधार इसी म्यूजियम में प्राय: बैठकें करते थे। राज परिवार के लोगों के मोम के पुतलों के आधार पर पहचान कर उन्हें कत्ल किया गया और कुछ कटी मुंडियों को म्यूजियम में मोम के मुखौटे गढऩे के लिए लाया भी जाता था। मैडम तुसाद के सभी भाई राजा की सेना में थे और उन्हें परिवार सहित कत्ल किया गया। केवल मैरी को कुछ वर्ष जेल की यातना सहनी पड़ी।

डॉ. गुयालोटाइन ने सिर धड़ से अलग करने के उपकरण की ईजाद की थी और चालीस हजार लोगों के सिर धड़ से भीड़ ने अलग किए और बाद में किए गए शोध से सिद्ध हुआ कि उनमें से नब्बे प्रतिशत लोग निर्दोष आम आदमी थे। अंधी अराजकता की हद यह थी कि सोलह व्यक्तियों के परिवार को केवल इसलिए मार दिया गया कि उनके घर में महारानी के नाम का एक रुमाल मिला, जो उन्हें सड़क पर मिला था। उपकरण ईजाद करने वाले ने उपकरण का नाम बदलने की प्रार्थना की थी, जिसके अस्वीकृत होने पर उन्होंने अपना सरनेम ही बदल दिया। बहरहाल क्रांति के पहिए निर्दोष लोगों को भी कुचल देते हैं।

दरअसल वाकचातुर्य से व्यक्ति भीड़ एकत्रित करता है और उसे एक नशे में गाफिल कर देता है। बाद में भीड़ की प्रशंसा वक्ता को नशे में चूर कर देती है और सारा मामला नियंत्रण के बाहर चला जाता है। वक्ता जानता है कि वह लफ्फाजी से मायाजाल बुन रहा है, फिर हजारों की तालियों से मंत्रमुग्ध होकर वह स्वयं पागल भीड़ का हिस्सा बन जाता है। भीड़ का सामूहिक मनोविज्ञान अजीब ढंग से काम करता है। घर में बैठकर परिवार से स्नेह करने वाला व्यक्ति भीड़ में शामिल होकर हिंसक हो जाता है। आम व्यक्ति का घर में व्यवहार, सड़क पर व्यवहार, सिनेमाघर में प्रतिक्रिया और भीड़ में विवेक खोना अलग-अलग होता है और हर आदमी के पीछे उसके दस स्वरूप विद्यमान होते हैं।

Friday, 10 June 2011

विज्ञान फंतासी और मानवीय स्पर्श


शाहरुख खान की एक सौ बीस करोड़ रुपए की लागत से बनी सुपरहीरो विज्ञान फंतासी फिल्म ‘रा.वन’ दिवाली पर प्रदर्शित होने जा रही है, परंतु चार माह पूर्व ही उन्होंने अपने चिरपरिचित जोश वाले अंदाज में प्रचार प्रारंभ कर दिया है और अपने ट्रेलर के प्रदर्शन के समय देश-विदेश के पचपन सिनेमाघरों में वे स्वयं मौजूद रहेंगे। यह खेल शुरू हो चुका है। इस फिल्म की प्रेरणा उन्हें अपने पुत्र से मिली है, जो आजकल के तमाम बच्चों की तरह विज्ञान फंतासी फिल्में और वीडियो गेम्स पसंद करता है।

शाहरुख खान यह साबित करना चाहते हैं कि भारत में भी विशेष प्रभाव वाले तकनीक से बने दृश्य हॉलीवुड से बेहतर बन सकते हैं। यह अजीब-सा इत्तफाक है कि अमेरिका युद्ध के लिए मारक हथियार बनाने में जितना कुशल है, उतना ही हॉलीवुड सिनेमा विज्ञान फंतासी बनाने में निपुण है। और युद्ध तथा मनोरंजन का क्या संबंध हो सकता है, यह वही बता सकते हैं।

शाहरुख खान का फरहा खान की पसंद के सिनेमा से इनकार करने के पीछे भी कोई व्यक्तिगत कारण नहीं है। वह सिनेमा में तकनीकी विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं। यह व्यक्तिगत रुचि और स्वतंत्रता का मामला है। उन्हें मसाला फिल्मों की जगह तकनीकी चमक-दमक के कौतुक पसंद हैं। ज्ञातव्य है कि शंकर की ‘रोबोट’ पहले शाहरुख ही निर्मित करने वाले थे, परंतु शंकर विशेष प्रभाव वाले दृश्यों के लिए उनके मुंबई स्थित स्टूडियो में महीनों तक काम करने के बदले वही काम चेन्नई में करना चाहते थे।

मोगेंबो और गब्बरसिंह से प्रभावित शाहरुख ने अपने ‘रा.वन’ नामक खलनायक का पात्र ऐसा गढ़ा है, जो टेक्नोलॉजी से शक्ति प्राप्त करता है गोयाकि यह ‘शान’ के शाकाल का आधुनिक स्वरूप है। आज तकनीकी गुणवत्ता से युक्त विज्ञान फंतासी के साथ ही विधु विनोद चोपड़ा और राजकुमार हीरानी का सिनेमा भी सफल है, जो कथा में मानवीय भावनाओं का संसार रचते हैं और इस तरह की दो धाराएं भारतीय सिनेमा के उद्गम से ही चली आ रही हैं।

हिमांशु राय तकनीक के लिए जर्मनी से विशेषज्ञ आमंत्रित करते थे और उसी कालखंड में शांताराम घोर भारतीयता का आग्रह करते थे। शाहरुख खान ने ‘छम्मक छल्लो’ जैसा गीत भी फिल्म में रखा है और करीना कपूर के अपने जलवे भी हैं।

शाहरुख खान का यह भी दावा है कि प्राय: फिल्मों में माता और पुत्र के रिश्ते दिखाते हैं और उनका खयाल है कि उनकी ‘रा.वन’ पिता-पुत्र रिश्ते की पहली फिल्म है। प्रचार के जोश में वे इस तथ्य को नजरअंदाज कर गए कि ‘आवारा’ और ‘मुगल-ए-आजम’ पिता-पुत्र रिश्तों की फिल्में थीं और वर्ष 1950 में बनी ‘संग्राम’ के आधार पर सलीम-जावेद की रची ‘शक्ति’ भी पिता-पुत्र के रिश्ते की फिल्म थी तथा अमिताभ बच्चन की दोहरी भूमिकाओं वाली ‘आखिरी रास्ता’ पिता-पुत्र कहानी थी।

भारतीय समाज और सिनेमा में पिता-पुत्र, माता-पुत्र इत्यादि कहानियां फिल्माई जाती रही हैं और पिता-पुत्री कथाओं का अकाल रहा है क्योंकि पुत्रों को हथियारों की तरह और पुत्रियों को अपने सिर पर लटकती तलवारों की तरह पाला जाता रहा है।बहरहाल, आमिर और सलमान की सफलता से शाहरुख विचलित नहीं हैं क्योंकि वह अब अलग किस्म की फिल्मों के प्रति आकर्षित हैं और बतौर अभिनेता भी उनकी आखिरी अच्छी फिल्म ‘चक दे इंडिया’ थी।

फरहा खान से फारिग होना उनके नए झुकाव का संकेत है। उनकी फिल्म की प्रथम झलक का आखिरी शॉट यह है कि हवा में उड़ता हुआ नायक नायिका की कार के बोनट पर आ बैठा है और शीशे के पार निकला एक हाथ गालों की ओर बढ़ता है, गोयाकि शीशा तड़का नहीं और मनुष्य का स्पर्श भी हो रहा है। विज्ञान फंतासी भी मनुष्य के स्पर्श के बिना स्पंदनहीन ही होती है।

10 वर्षीय लड़की ने ख़ोला समाज का काला चिट्ठा


भारत, यमन, अफगानिस्तान और इथोपिया जैसे देशों में बेहद कम उम्र में लड़कियों की शादी एक ऐसा प्रचलन बन चुका जिसकी वजह से इन देशों में लड़कियों की औसत आयु में तेजी से गिरावट आई है.


दरसल जल्दी शादी होने की वजह से कह उम्र में वो ज्यादा बच्चे पैदा कर रही हैं जिसका असर सीधे उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. डेली मेल में छपी रिपोर्ट के मुताबिक इन देशों में बेहद कम उम्र की लड़कियों को उनसे कहीं ज्यादा उम्र के लडको के साथ ब्याह दिया जाता है. इनमे से ज्यादतर मर्द या तो अधेड़ होते हैं या तलाकशुदा. ऐसे मामले भी सामने आये हैं जब इन पुरुषों ने पहले लड़की के साथ रेप किया और बाद में दबाव बनाकर उससे शादी कर ली.


अनुमान के मुताबिक हर साल लगभग एक से सवा करोड़ लड़कियां ऐसे विवाह का शिकार बनती हैं.


एक लड़की की बहादुरी ने ख़ोल दी थी समाज की पोल


गौरतलब, है कि तीन साल पहले यमन में एक दस साल की लड़की अपने पति के घर से भाग कर कोर्ट पहुंची और उसने अपने ३० साल के पति से तलाक की मांग की. उसने आरोप लगाया कि वह उसे रोज पीटता है. घटना के बाद इस लड़की की हिम्मत लोगों के लिए मिसाल बन गई. उसके ऊपर एक किताब भी लिखी गई जिसे ३० भाषाओं में अनुवादित भी किया गया है. इस किताब का टाइटिल है 'आइ एम नुजूद, एज १० एंड डीवोर्सड' . 
इसी तरह कि एक दूसरी घटना में यमन कि ही एक दस साल की लड़की आयशा को ५० साल के व्यक्ति के साथ ब्याह दिया गया था. उसकी बहन फातिमा ने पत्रकारों को बताया कि जब भी उसकी बहन उसे फोन करती है तो रोती ही रहती है. उसके पति ने धमकी दी है अगर उसने किसी से ये सब बताया तो जेल से बाहर आने पर वह उसका क़त्ल कर देगा.

‘मुन्नी’ मध्यप्रदेश में जन्मी!


‘खामोश पानी’ जैसी सार्थक फिल्म की लेखिका परोमिता वोहरा ने ‘पार्टनर्स इन क्राइम’ नामक वृत्तचित्र बनाया है, जिसके लिए उन्हें साधन और धन जुटाया दिल्ली की मैजिक लैन्टर्न फॉउंडेशन ने और यह वृत्तचित्र उनकी साइट www.magiclanternfoundation.org पर उपलब्ध है। इस वृत्तचित्र को बनाने का उद्देश्य सृजन और कॉपीराइट नियम पर रोशनी डालना और संसद में प्रस्तुत नए एक्ट और बाजार में हो रही व्यापक चोरी की ओर ध्यान दिलाना है। टेक्नोलॉजी ने सांस्कृतिक स्वतंत्रता प्रदान की है या सृजन अधिकारों की चोरी के लिए पगडंडियां रची हैं।

यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि व्यवस्था में मौजूद सड़ांध को बुहारने के नाम पर विविध मुखौटे लगाकर कितनी मासूमियत से संविधान को तोड़ने की साजिश हो रही है। संविधान से ऊपर कुछ शक्तियों के ठिए बनाने का प्रयास हो रहा है, गोयाकि महान बाबा आंबेडकर रचित संविधान की अवहेलना की जा रही है। इसी समय परोमिता वोहरा ने संगीत क्षेत्र में अराजकता की बात उठाई है।

परोमिता ने ‘मुन्नी गीत’ के उद्गम तक जाने का प्रयास किया है। ‘दबंग’ के प्रदर्शन के समय इस गीत को पाकिस्तान के लोकगीत की नकल बताया जा रहा था, परंतु वोहरा ने दावा प्रस्तुत किया है कि यह मध्यप्रदेश में जन्मा गीत है। 1970 में रजिया बेगम नामक लोक गायिका ने अनेक मंचों पर प्रस्तुत किया ‘लौंडा बदनाम हुआ नसीबन तेरे लिए’ और इसके अनेक भोजपुरी, पाकिस्तानी संस्करण बने।

यहां तक कि हमेशा सोने से लदे रहने वाले महान बप्पी लहरी ने भी एक गीत रचा और ‘दबंग’ के दिनों स्वयं को इस गीत का मौलिक रचियता भी बताने के प्रयास किए। वोहरा ने यह भी खोजा है कि नौटंकी कलाकार रामपत और रानी बाला ने इस शरारती मुन्नी का एक पूरी तरह अश्लील संस्करण भी रचा है, जो गांवों और कस्बों में बिना झिझक रस लेकर सुनाया गया है।

‘दबंग’ के इस गीत के बोल लिखने का श्रेय फिल्म के निर्देशक अभिनव कश्यप ने लिया है और ललित (जतिन-ललित टीम के छिटके हुए सदस्य) ने धुन बनाने के लिए नाम और दाम कमाए हैं। मूल सृजनकर्ता रजिया बेगम को न कोई श्रेय मिला और न ही कानी कौड़ी मिली है। इसी को सामने रखकर परोमिता वोहरा ने क्रिएटिविटी और कॉपीराइट की बात प्रस्तुत की है।

20 फरवरी 2009 को राकेश मेहरा की ‘दिल्ली 6’ नामक फिल्म प्रदर्शित हुई। इसमें प्रसून जोशी का लिखा और एआर रहमान के संगीत से सजा गीत ‘ससुराल गेंदा फूल’ बहुत लोकप्रिय हुआ था और विगत कई महीनों से इसी नाम का पारिवारिक सीरियल भी दिखाया जा रहा है। 21 फरवरी 2009 को इसी कॉलम में लिखा गया था, यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि फिल्म में छत्तीसगढ़ के कवि गंगाराम तिवारी और संगीतकार भुलावाराम यादव की रचना ‘सास गारी देवे, ननद मुहा लेवे देवर बाबू मोर’ गीत के बोल और धुन में थोड़ा-सा फेरबदल किया गया है। इसमें छत्तीसगढ़ के महान लोकगीत का इस्तेमाल किया गया है और मूल लेखक, संगीतकार और गायिकाएं जोशी बहनों का नाम क्रेडिट में नहीं दिया गया है। जोशी बहनों ने रायपुर आकाशवाणी के लिए 1970 में इसे रिकॉर्ड किया था।

यह संभव है कि रहमान की संगीत प्रशिक्षण संस्था में छत्तीसगढ़ के किसी युवा ने यह सदियों पुराना लोकगीत गाया हो और किसी सहायक के माध्यम से यह गेंदा फूल ससुराल पहुंच गया। बहरहाल, ‘पार्टनर्स इन क्राइम’ नामक वृत्तचित्र से मौलिकता के मुद्दे पर नए सिरे से बात की जा सकती है।

संशोधित बिल गीतकार और संगीतकार तथा उनकी आगामी पीढ़ियों को रॉयल्टी का अधिकार देता है, जैसा कि पश्चिम के देशों में है, जहां गीत फिल्मों में नहीं होते वरन उनका अपना बाजार ही अलग है। भारत में फिल्म गीत के निर्माण में फिल्मकार का भी योगदान होता है। अनेक हिट मुखड़े फिल्मकारों ने बनाए हैं। फिल्म का छायांकन और प्रचार भी बहुत कुछ निर्भर करता है। ‘मुन्नी’ सचमुच में सफल थी, परंतु उसी की तर्ज पर ‘शीला’ की सफलता बाजार और प्रचार की ताकतों ने गढ़ी है। फिल्म संगीत बेचने वाली सारी कंपनियों का कैरेक्टर ढीला है।

Wednesday, 8 June 2011

FREQUENCY (2000) MOVIE REVIEW

Storyline

A rare atmospheric phenomenon allows a New York City firefighter to communicate with his son 30 years in the future via short-wave radio. The son uses this opportunity to warn the father of his impending death in a warehouse fire, and manages to save his life. However, what he does not realize is that changing history has triggered a new set of tragic events, including the murder of his mother. The two men must now work together, 30 years apart, to find the murderer before he strikes so that they can change history--again. 

Review

A Brilliantly crafted sci-fi flick..... Must Watch....

Changing the past to affect the future may not be a new concept in film, but "Frequency" handles it deftly and with heart. The acting is superb, and as far as I can tell the plot is nearly airtight. It keeps you on your toes as the story twists in what feels like six directions at once and keeps you in emotional sync with the characters. The past/present connections are stirring and intriguing, especially the single-flash cuts at pivotal moments. This is one of the few movies about which I can honestly say, "I laughed, I cried, I was scared stupid."

Directed by
Gregory Hoblit 
 
Writing credits
(WGA)
Toby Emmerich

Cast

Cast overview, first billed only:
Dennis Quaid Dennis Quaid ...
James Caviezel James Caviezel ...
John Sullivan (as Jim Caviezel)
Shawn Doyle Shawn Doyle ...
Elizabeth Mitchell Elizabeth Mitchell ...
Andre Braugher Andre Braugher ...
Noah Emmerich Noah Emmerich ...
Gordo Hersch
Melissa Errico Melissa Errico ...
Samantha Thomas
Daniel Henson Daniel Henson ...
Johnny Sullivan (6 Years)
Jordan Bridges Jordan Bridges ...
Graham 'Gib' Gibson
Stephen Joffe Stephen Joffe ...
Gordo Hersch (8 Years)
Jack McCormack Jack McCormack ...
Commander Butch O'Connell
Peter MacNeill Peter MacNeill ...
Butch Foster
Michael Cera Michael Cera ...
Gordy Jr. (10 Years)
Marin Hinkle Marin Hinkle ...
Sissy Clark
Richard Sali Richard Sali ...
Chuck Hayes