Wednesday, 8 June 2011

मुंबइया फिल्मों में विदेशी बालाएं


महेश भट्ट की सफल फिल्म ‘मर्डर’ के भाग दो में श्रीलंका की जैक्लीन फर्नाडीज अभिनय कर रही हैं और पहले भी वे ‘अलादीन’ तथा ‘जाने कहां से आई है’ जैसी फिल्में कर चुकी हैं। भट्ट साहब की फिल्मों में पाकिस्तानी अदाकारा मीरा भी काम कर चुकी हैं। प्रकाश झा की ‘राजनीति’ में लंदन की सारा थॉमसन ने अभिनय किया था। इम्तियाज अली की ‘लव आज कल’ में ब्राजील की बाला गिजेल मोंटेरियो ने पंजाब की कुड़ी की भूमिका निभाई थी। इस समय मुंबई में एक दर्जन विदेशी बालाएं सिनेमा में अवसर के लिए स्वयं को तैयार कर रही हैं।

एक ईरान मूल की जर्मन बाला दिल आर्य फिल्म संगीत पर शोध कर रही हैं और साथ ही अपनी छोटी बहन के लिए अभिनय अवसर खोज रही हैं।

दरअसल ये सब कैटरीना कैफ की सफलता से प्रेरित हैं। दूसरी बात यह है कि भारत का अति आतुर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया छोटी-सी भूमिका करते ही विदेशी कन्या को स्टार बना देता है और सेलिब्रिटी स्टेटस प्रदान करता है। इन बालाओं ने इतनी आसानी से अपने मुल्कों में किसी को लोकप्रियता हासिल करते नहीं देखा है, जबकि हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पश्चिम की सनसनी वाली लहर का ही अनुसरण कर रहा है।

इस समय रूस, इंग्लैंड और यूरोप के देशों से कन्याएं भारत आ रही हैं और यह एक छोटा-मोटा ‘अलडिरेडो’ अर्थात स्वर्ण की तलाश बन जाने वाला प्रकरण है। इन युवा महत्वाकांक्षी बालाओं के लिए भारत आज भी ‘सोने की चिड़िया’ है और अमेरिका के बाद शायद सबसे बड़ा स्वर्ण भंडार भारत ही है। इसका कुछ श्रेय भारतीय मध्यमवर्गीय महिलाओं को जाता है, जो किसी तरह थोड़ा-थोड़ा धन जोड़कर हर आखातीज पर थोड़ा-सा सोना अवश्य खरीदती हैं और यह परिवार का ‘काला धन’ है, क्योंकि घर खर्च में से पुरुषों से छुपाकर यह धन बचाया जाता है। इसका कुछ श्रेय सोना तस्कर दाऊद को भी जाता है, जिसने सरकार की बेतुकी बंदिश के दिनों में बेहिसाब सोने से भारत के शहरों की सराफा गलियों को लाद दिया था और तस्करी में सहयोग के लिए मंत्रियों और अफसरों को भी रिश्वत के धन से सोना खरीदने की प्रेरणा दी थी।

दरअसल युवा बालाओं के यहां आने का एकमात्र कारण उनकी महत्वाकांक्षा नहीं है। उनके देश में इस कदर आर्थिक मंदी है कि उनके पास इसके सिवा विकल्प भी नहीं है। इंग्लैंड में बूढ़ों को प्रश्रय देने का सरकारी नियम है और वे उन्हें उनकी इच्छा से भारत में रखते हैं, क्योंकि यहां चीजें उनके देश से सस्ती हैं। प्रगति में रुकावटें डालने वाली सरकारों, अधिकतम लोगों द्वारा भ्रष्टाचार में डूबे रहने और व्यावसायिक हुड़दंगों के तांडव के बावजूद यह अजब-गजब भारत की प्रगति सचमुच आश्चर्यजनक है। चीन के उद्यमी भारतीय दशा में एक दिन भी काम नहीं कर सकते।

बहरहाल, विदेश से युवा कन्याओं का भारतीय फिल्मों में आना नया नहीं है। 1922 में निर्माता जमशेदजी मदान की ‘पति भक्ति’ नामक फिल्म की केंद्रीय पात्र इटली की सेनोरा मिनोली थीं और इंग्लैंड की पेशेंस कूपर भी इसमें थीं। पहली एक्शन नायिका नाडिया भी ऑस्ट्रेलिया से आई थीं। किशोर साहू की ‘मयूरपंख’ में भी एक विदेशी बाला थी। चेतन आनंद भी प्रिया राजवंश को लंदन से लाए थे।

मेहमूद की ‘कुंआरा बाप’ में भी विदेशी बाला थी। राजकपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ के सर्कस चैप्टर की नायिका क्षेनिया रिविन्कना भी रूसी महिला थीं। आजकल आइटम नृत्य में नायिका के साथ नाचने वाली लड़कियां आसानी से मिल जाती हैं। विदेश से भारत में पढ़ने आने वाली लड़कियां भी इस तरह की शूटिंग में भाग लेकर अपना साल भर का खर्च निकाल लेती हैं। हम कितना ही तोड़ें, यह देश जुड़ता ही चला जाता है।

अर्जुन रामपाल का तीर निशाने पर


अर्जुन रामपाल शाहरुख खान की महत्वाकांक्षी फिल्म ‘रा.वन’ में प्रमुख खलनायक की भूमिका कर रहे हैं और हाल ही में उन्होंने ऐश्वर्या राय केंद्रित मधुर भंडारकर की फिल्म ‘हीरोइन’ में नायक की भूमिका स्वीकार की है। ज्ञातव्य है कि स्वयं ऐश्वर्या राय द्वारा निर्मित फिल्म ‘दिल का रिश्ता’ में भी अर्जुन उनके नायक रह चुके हैं। दरअसल फरहान अख्तर की ‘रॉक ऑन’ में समानांतर भूमिका के बाद उनकी पहचान बनी और ‘ओम शांति ओम’ में उनकी खलनायकी को प्रशंसा प्राप्त हुई थी।

सातवें दशक में फिल्मों के महत्वपूर्ण पूंजी निवेशक रहे गुलशन राय के सुपुत्र राजीव राय ने अजरुन रामपाल को नायक लेकर दो असफल फिल्में बनाई थीं और किसी भी नवागंतुक का कॅरियर नष्ट करने के लिए दोनों फिल्में काफी थीं, परंतु जुझारू अजरुन डटे रहे। फिल्म उद्योग में टिके रहकर महत्वपूर्ण लोगों से संपर्क बनाए रखने से काम बन जाता है। इस उद्योग में औसत प्रतिभा वालों को भी सही लोगों से सही वक्त पर मेल-मिलाप करते रहने और चुस्त शरीर के दम पर काम मिल ही जाता है।

विगत दो दशक में अभिनेता बनने के लिए कसरती शरीर, घुड़सवारी, तैराकी और नृत्य के लिए यथेष्ट चपलता होना अच्छा अभिनेता होने से बेहतर माना गया है और अभिनय प्रशिक्षण की किसी संस्था में जाने से भी ज्यादा जरूरी है जिम में जाना। मुंबई में बॉडी बिल्डिंग एक बड़ा कारोबार है और जमीनों के आसमानी मूल्यों के होते हुए भी पंद्रह हजार वर्गफुट की जगह पर आधुनिकतम उपकरणों से सुसज्जित जिम में एक घंटे की वर्जिश के लिए पंद्रह सौ रुपए तक देने वालों की कमी नहीं है।

यह तेजी से बदलते हुए भारत की हकीकत है कि मुंबई में वड़ा-पाव स्टॉल से अधिक संख्या में जिम खुले हुए हैं, चायघरों से ज्यादा बार हैं और पान की दुकानों से ज्यादा वाइन की दुकानें हैं। यही सब अनेक छोटे और मध्यम शहरों में भी कम स्केल पर घटित हो रहा है। अनेक मध्यम श्रेणी के उभरते हुए शहर बेकरार हैं महानगर बनने के लिए, इसलिए आपको मुंबई के बच्चे के नाम वाले कई शहर मिल जाएंगे। आज के दौर में बड़ा होना खुश रहने से बेहतर माना गया है।

बहरहाल, अर्जुन रामपाल बॉक्स ऑफिस पर अपना मूल्य बढ़ाते जा रहे हैं और यह इसलिए नहीं हो रहा है कि उनकी किसी फिल्म में मौजूदगी के कारण दो-चार सिनेमा टिकट बिकते हैं, वरन इसलिए हो रहा है कि चुस्त-दुरुस्त शरीर के साथ सुंदर से चेहरे की आवश्यकता है इस स्वप्न उद्योग को। दूसरा कारण यह है कि नायिका केंद्रित फिल्म में काम करने के लिए कोई भी सुपर सितारा तैयार नहीं होता। इन बातों का सारांश यह है कि रिक्त स्थान की पूर्ति मात्र कर देने के लिए भी लोगों की आवश्यकता होती है। अखबारों में शब्द-शक्ति टटोलने के लिए रिक्त स्थान की एक प्रतियोगिता होती है-दाएं से बाएं और ऊपर से नीचे संकेत होता है कि किसी शब्द के स्पेलिंग में एक अक्षर गायब है और उसे भरिए। फिल्म उद्योग में पात्र चयन में भी कुछ रिक्त स्थान होते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि इस खेल को खेलने से स्मरण शक्ति मजबूत होती है। ब्रिज और शतरंज खेलने वालों को स्मृति विलोप होने की अल्झाइमर बीमारी नहीं होती।

बहरहाल, अर्जुन रामपाल को अपने मन का मेहनताना और काम मिल रहा है। आज अभिनय क्षमता की फिल्मों में उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी राजनीति में है। हमारी सामाजिक संरचना कुछ ऐसी हो गई है कि प्रतिभा और परिश्रम की जगह तिकड़मबाजी और बुद्धि के बदले लफ्फाजी तथा सत्य के बदले चीख-चीखकर बोला हुआ झूठ जीत जाता है।

Monday, 6 June 2011

मसाला तर्कहीनता के पीछे की योजना


व्यावसायिक सिनेमा की आत्मा का पंछी बॉक्स ऑफिस में कैद होता है और इस माध्यम पर इतना अधिक धन खर्च होता है कि अधिकतम दर्शकों के सहयोग के बिना इसका अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। हर दर्शक की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद और पूर्वग्रह के स्थापित तथ्य के कारण सामूहिक पसंद का आकलन असंभव है। हर फिल्मकार दर्शक से भावनात्मक तादात्म्य के लिए प्रयास करता है और लोकप्रियता के रहस्यमय रसायन की कीमिया खोजना चाहता है। इसका कोई एक फॉमरूला नहीं है और अनेक दिशाओं में हाथ-पैर मारे जाते हैं, गोयाकि डूबता हुआ आदमी तिनके का सहारा खोजता है।

अनीज बज्मी की ‘रेडी’ में नायिका फेरे लेते समय नायक से कहती है कि फेरे अधूरे छोड़कर अपने पिता की रक्षा के लिए जाओ, क्योंकि पत्नी कभी भी मिल सकती है, परंतु पिता जीवन में एक बार ही मिलता है। यह संवाद एक महिला दर्शक को बहुत अच्छा लगा और उसे मैंने यह कहते हुए सुना। दर्शक की प्रतिक्रिया में बहुत से तथ्य प्राप्त होते हैं। यह पत्नी-पिता की बात सलीम साहब प्राय: करते हैं और सलमान खान के माध्यम से अनीस बज्मी तक पहुंची होगी।

‘रेडी’ की सफलता अनायास नहीं है। इस मसाला फिल्म में परिवार की भावना और प्रेम के महत्व को प्रस्तुत किया गया है और एक दृश्य में नायक फूलों के गुलदस्ते से प्रहार करता है और पिटने वाले की प्रतिक्रिया है, मानो पत्थर से प्रहार हुआ हो। अगले ही शॉट में हाथ में गुलाब लिए एक प्रहार खलनायक के होश उड़ा देता है। यह एक हास्य दृश्य है। दरअसल ‘नो एंट्री’, ‘वांटेड’ और ‘दबंग’ के बाद इस फिल्म की रचना के समय सूरज बड़जात्या की फिल्मों की पारिवारिकता का हल्का-सा स्पर्श इसमें प्रस्तुत किया गया है। यहां तक कि नायक का नाम भी प्रेम है, जो सूरज की सभी फिल्मों में सलमान के लिए उन्होंने तय किया था, गोयाकि मारधाड़ की मसाला फिल्म में ‘प्रेम’ की वापसी एक सोची-समझी पहल है। क्या परोक्ष रूप से यह संकेत नहीं है कि मौजूदा मौज-मस्ती और हल्के मनोरंजन के दौर में ‘प्रेम’ और ‘पारिवारिकता’ का केवल तड़का ही लगाया जा सकता है? इसकी पुष्टि भी इस बात से होती है कि सूरज का अपना फॉमरूला विगत वर्षो में असफल रहा है। गोयाकि बुझी राख से अनीस ने एक चिंगारी निकाली और अपना तंदूर गरमा लिया।

सलीम-जावेद ने ‘दीवार’ में कुली के बिल्ले को उसके अच्छे भाग्य का प्रतीक बनाया- नंबर ७८६ धर्म से जुड़ा है। बरसों बाद यशराज बैनर की ‘वीर जारा’ फिल्म में पाकिस्तान की सहृदय वकील साहिबा रानी मुखर्जी जेलर से कहती हैं कि बेअदब इंसान क्या तुमने सोचा है कि इस निरपराध हिंदुस्तानी को कैदी नं. ७८६ किस निजाम के तहत मिला है। यह कैसा संकेत है? अधिकतम की भावुकता को झंकृत करने के ऐसे सभी प्रयास सोचे-समझे खेल ही होते हैं।

आमिर खान की आशुतोष गोवारीकर रचित ‘लगान’ में दलित जाति के पोलियोग्रस्त युवा की गेंद स्वाभाविक रूप से स्पिन करती है और उसके टीम में चयन के जातिवादी पूर्वग्रह के खिलाफ नायक उठ खड़ा होता है। ‘प्रेमरोग’ में संकीर्णता से ग्रस्त व्यक्ति मर गया और उसकी आंख बंद करते समय संवाद है कि वक्त रहते आंख खुल जाती तो यह अनर्थ नहीं होता। ‘राम तेरी गंगा मैली’ में भ्रष्ट नेता अपने होने वाले दामाद से पूछता है कि बनारस से तुम्हारे लिए क्या भेंट लाऊं।

पहाड़ी लड़की के प्रेम में तल्लीन नायक कहता है, ‘हो सके तो गंगा ले आना’ और अनजाने ही भ्रष्ट नेता कोठे से गंगा नामक लड़की को ले आता है, जो उसके पैरों के नीचे से कालीन ही खींचने का माध्यम बनती है।

‘मुगल-ए-आजम’ में शहंशाह के न्याय की तराजू पर वर्षो पूर्व उसके द्वारा एक ‘नाचीज बांदी’ को वादे के स्वरूप दी गई अंगूठी पलड़े को झुका देती है और एक शक्तिशाली बादशाह कितना कमजोर और निरीह हो जाता है।

सारांश यह है कि मसाला और तर्कहीन फिल्मों को गढ़ने के पीछे एक बहुत ही सुलझी विचार शैली है जो विचार के तमाम आयामों के साथ भावनात्मक कमजोरियों को भी भुनाना जानती है। सामूहिक भावना को उभारना या कमजोर नस पर हाथ रखना आसान नहीं है। जो काम फिल्मकार मनोरंजन गढ़ने के लिए करते हैं, वही काम नेता और धर्म के मठाधीश भी अत्यंत चतुराई से करते हैं। अंतर केवल एक उद्देश्य का है। एक पैसा बना रहा है, दूसरा सत्ता चाहता है। बेचारे आम आदमी को मालूम ही नहीं कि उसकी भावना का दोहन कौन, कब और क्यों करता है।

Saturday, 4 June 2011

सिनेमा और समाज में अराजकता

हिंदुस्तानी सिनेमा में दूसरे विश्वयुद्ध के समय वस्तुओं के अभाव और कालाबाजारी के उद्भव के साथ शशधर मुखर्जी ने फॉर्मूले का विकास किया, जिसके विविध स्वरूपों में एक है अराजकता का संकेत देना और उसे सामाजिक न्याय के लिए किए गए संघर्ष का मुखौटा देना। अशोक कुमार अभिनीत ‘किस्मत’, ‘संग्राम’ इत्यादि फिल्मों में प्रतिगामी नायक की छवि गढ़ी गई और कोई तीस वर्ष पश्चात सलीम-जावेद ने इसी गुस्सैल, हिंसक नायक की छवि ‘जंजीर’, ‘दीवार’ और ‘त्रिशूल’ में प्रस्तुत की। मीडिया ने इसे आक्रोश की छवि की तरह प्रचारित कर दिया।

गौरतलब यह है कि इन फिल्मों का नायक सामाजिक लड़ाई नहीं लड़ रहा है, वह व्यक्तिगत बदले ले रहा है। इसी बिंदु पर पांचवें-छठे दशक की सामाजिक प्रतिबद्धता भंग होती है। बाद के वर्षों में यही आक्रोश की मुद्रा वाला नायक अराजकता का प्रतीक बन जाता है और ‘शहंशाह’ इत्यादि अनेक फिल्मों में व्यवस्था को तोड़ते हुए सगर्व कहता है कि वह जहां खड़ा है, वही अदालत है और उसके मुंह से निकले शब्द कानून हैं। इस तथाकथित आक्रोश की लहर अमिताभ बच्चन का सितारा करिश्मा घटते ही लोप हो गई।

लगभग दो दशक तक आप्रवासी भारतीय लोगों के कारण डॉलर सिनेमा का बोलबाला रहा, परंतु ‘गजनी’ और ‘वांटेड’ के साथ ठेठ भारतीय फॉर्मूले की वापसी हुई। देखिए किस कदर मासूमियत से अराजकता के रेशे गूंथे जाते हैं। ‘वांटेड’ का नायक गुंडा है, हड्डियां तोड़ता है और कानून के साथ खेलता है। बाद वाले हिस्से में बताया गया कि वह दरअसल पुलिसवाला है और अपराध सरगना की शिनाख्त करके उसे खत्म करने के लिए गुंडा बना था। इसी फॉर्मूले में शामिल है कानून के माखौल के लिए रॉबिनहुड के रेशों को शामिल करना कि नायक अमीरों को लूटकर गरीबों में धन बांटता है।

इस किस्म का पुलिसवाला ‘दबंग’ में मधुर संगीत और ताजगी वाली प्रेम-कथा को जोड़कर विराट सफलता अर्जित करता है। दरअसल, हमारी सड़ांध भरी भ्रष्टï व्यवस्था से जनता इतनी नाराज है कि नियमों और आचार संहिता को तोडऩे वाला हमें सड़ांध के प्रति विरोध करता नजर आता है। सच तो यह है कि तमाम लोग ही इस व्यवस्था को भ्रष्टï करने में लगे रहे हैं। गणतंत्र का यही रूप अनेक देशों में सफल है और ब्रिटेन मेें शताब्दियों ने इसे परखा है और वहां आज भी खरा है, परंतु भारत में यह कलंकित हो गया है।

इतिहासबोध से वंचित बौने लोग सत्ता की ऊंची कुर्सियों पर बैठकर इस आदर्श व्यवस्था का बुरा हाल करते रहे और शायद अनजाने ही उन्होंने अराजकता की पैरवी कर डाली। अफसोस तो इस बात का है कि फिल्म उद्योग ने भी अपने फॉर्मूले में, जिसका मूल उद्देश्य केवल मनोरंजन गढऩा था, अनजाने ही अराजकता की पैरवी कर डाली। अशोक कुमार, अमिताभ बच्चन, रजनीकांत और सलमान खान की सितारा छवि का लाभ लेकर ‘किस्मत’ से ‘दबंग’ तक अराजकता का महीन रेशा आ गया है। सच तो यह है कि सामंतवाद को घुट्टïी में पीने वाला हमारा अवाम भी इस तत्व को पसंद करते हुए हमेशा घोड़े पर सवार किसी चक्रवर्ती सूर्यवंशी, चंद्रवंशी महाराज का इंतजार करता है। फिल्मकार केवल इस पसंद के बॉक्स ऑफिस स्वरूप की खातिर यह करते हैं।

भ्रष्टïाचार के तांडव के कारण अब आमरण अनशन अत्यंत मनोवैज्ञानिक कुशलता से गढ़े जा रहे हैं और मजे की बात यह है कि मांगें ऐसी हैं कि संविधान ही बदलना पड़ेगा। गोयाकि दोषपूर्ण क्रियान्वयन के कारण एक आदर्श को ही नष्टï किए जाने की मांग है। बाबा आंबेडकर जैसे महान व्यक्ति ने अपनी विद्वान टीम के साथ संविधान रचा था। दरअसल नैतिक मूल्यों का अभाव और सांस्कृतिक शून्य की जड़ को फिर अनदेखा करके लाक्षणिक इलाज खोजा जा रहा है।

पूंजीवादी व्यवस्था अपने ढंग और पसंद का अपराध संगठन समानांतर सरकार के रूप में गढ़ती है। अब एक नया नितांत भारतीय स्वरूप उभरा है कि राजनीतिक दोषों के निवारण के लिए संन्यासी मुखौटे का इस्तेमाल हो रहा है। हम यह भी अनदेखा कर रहे हैं कि पड़ोस में धर्म के नाम पर देश चलाने वालों ने देश ही भंग कर दिया है और अब भारत को भी वैसा ही बनाने का षड्यंत्र रचा गया है।

Friday, 3 June 2011

न्यूड पोज देकर विवादों में फंसी एक और आईटम गर्ल


आईटम गर्ल लिजा मालिक जानवरों के अधिकारों के लिए कार्यरत संगठन पेटा को न्यूड पोज देकर नए विवाद में फंस गई हैं|लिजा ने क्रिकेट में उपयोग की जाने वाली लेदर बॉल्स के उपयोग पर रोक लगाने की मांग को लेकर एक फोटोशूट कराया था जिसमें उन्होंने कुछ नहीं पहना था और एक बॉल के पोस्टर के सहारे अपने तन को ढँक रखा था|

एक महिला एनजीओ ने उनके ऐसा करने को अश्लीलता फैलाने वाला कैम्पेन करार दिया है और सस्ती पब्लिसिटी बटोरने के लिए न्यूड होना का आरोप लगाया है|मुंबई के नारी सम्मान संगठन की अध्यक्ष सुंदरी ठाकुर ने लिजा को महिलाओं की गरिमा और भावना को आहात करने के लिए एक क़ानूनी नोटिस थमा दिया है|

उनका मानना है कि नारी को देवी का रूप माना जाता है लेकिन लिजा ने ऐसा करके महिलाओं का अपमान किया है|उन्होंने कहा कि एक महिला न्यूड पोज देकर जानवरों के अधिकारों की रक्षा कैसे कर सकती है|

अगर उन्हें मदद करना ही है तो वह आर्थिक रूप से उनकी मदद कर सकती हैं मगर यह सब करके उनका इरादा पब्लिसिटी बटोरने से ज्यादा कुछ और नहीं हो सकता|आजकल कुछ आईटम गर्ल्स और मॉडल्स एनजीओ की आड़ लेकर अपने आपको इस तरीके से पेश कर खूब पब्लिसिटी बटोर रही हैं|

राज बब्बर : संसद व अभिनय अखाड़े में

सलमान खान और करीना कपूर अभिनीत फिल्म ‘बॉडीगार्ड’ के जरिए राज बब्बर बरसों बाद अभिनय क्षेत्र में वापसी कर रहे हैं। इसकी शूटिंग आजकल पटियाला में चल रही है। ज्ञातव्य है कि नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली से प्रशिक्षित राज बब्बर को बलदेव राज चोपड़ा की फिल्म ‘इंसाफ का तराजू’ के जरिए बॉलीवुड में पहली सफलता मिली, जिसमें उन्होंने खलनायक की भूमिका निभाई थी। बाद में केवल अपनी प्रतिभा के दम पर अनेक फिल्में बतौर नायक अभिनीत कीं। उन्हें बचपन से अभिनय का शौक था और मात्र तीस रुपए माहवार पर एक नाटक कंपनी में साफ-सफाई का काम इस उम्मीद पर करते रहे कि अभिनय का अवसर मिलेगा। उन्होंने लंबे समय तक संघर्ष किया और आर्थिक अभाव उनके उत्साह को कभी कम नहीं कर पाया। इसी जुझारूपन के साथ उन्होंने राजनीति में भी प्रवेश किया और वर्तमान में वे फिरोजाबाद से चुनकर आए सांसद हैं।

राज बब्बर पहले समाजवादी नेता हैं, जिन्होंने अमर सिंह की नीतियों के खिलाफ मुलायम सिंह को अपना विरोध दर्ज कराया था तथा बाद में अपना त्याग पत्र देकर कांग्रेस के टिकट पर फिरोजाबाद से मुलायम सिंह की बहू को चुनाव हराकर अमर सिंह के बर्खास्त होने का पथ प्रशस्त किया था। उन्होंने छात्र जीवन में भी राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई थी और जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से भी जुड़े रहे। आज वे सतर्क-सक्रिय सांसद हैं। फिल्म उद्योग से राजनीति में आने वाले वे एकमात्र व्यक्ति हैं, जिन्हें इस क्षेत्र की समझ रही है।

हॉलीवुड की प्रसिद्ध फिल्म ‘डेथविश’ से प्रेरित बीआर चोपड़ा की ‘आज की आवाज’ में उन्होंने सशक्त अभिनय किया था। वे इतने कुशल अभिनेता हैं कि नायक की भूमिकाएं करते समय ही उन्होंने पहलाज निहलानी की गोविंदा, चंकी पांडे अभिनीत ‘आंखें’ में खलनायक की भूमिका अत्यंत कुशलता से निभाई। इस समय फिल्मोद्योग में पिता की सशक्त भूमिका का हिस्सा बिल्कुल सूना है, क्योंकि अमिताभ बच्चन अब दादा-नाना लगते हैं। इसके साथ ही अमरीश पुरी की मृत्यु के बाद सशक्त खलनायक के क्षेत्र में भी कोई नहीं है।

राज बब्बर हर तरह की भूमिका कर सकते हैं। ‘बॉडीगार्ड’ की शूटिंग में भी अपना काम इतनी खूबी से कर रहे हैं कि पहले टेक में ही शॉट पसंद कर लिया जाता है। जन्मजात अभिनेता विभिन्न भूमिकाओं में उतनी ही सहजता से प्रवेश करता है, जैसे कोई व्यक्ति कपड़े बदलता है। सच तो यह है कि जीवन-मृत्यु भी मात्र चोला बदलना ही है और इसी बारे में शेक्सपीयर की यह उक्ति बार-बार कही जाती है कि दुनिया एक रंगमंच है, जहां हम अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाकर पटाक्षेप कर जाते हैं। रंगमंच से आए अभिनेता के लिए जीवन के विभिन्न आयामों का अर्थ समझना आसान होना चाहिए। उसे एक ही जीवन में कितने जीवनों का अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिलता है। सांप अपना केंचुल लंबे अंतराल में बदलता है, परंतु अभिनेता को यह अवसर बार-बार मिलता है और व्यस्त सिने कलाकार एक ही दिन में दो अलग फिल्मों में अलग-अलग भूमिकाएं करता है।

बहरहाल, राज बब्बर का भविष्य राजनीति और अभिनय दोनों क्षेत्रों में बहुत उज्ज्वल और चुनौतीभरा है, क्योंकि दोनों ही क्षेत्रों में समर्पित व्यक्तियों का अभाव है। आज राजनीति के क्षेत्र में समस्याएं विराट हैं और सजगता की आवश्यकता है। फिल्मों में भी चरित्र भूमिकाओं में नया कुछ करने का अवसर नायकों से अधिक है, क्योंकि नायक सफल छवियों की मजबूत जंजीरों से जकड़े रहते हैं। इसी तरह सांसदों को भी पार्टी का अनुशासन एक ओर खींचता है और उनका देशप्रेम दूसरी ओर। राज बब्बर ने संघर्ष भरा जीवन जिया है और वे मिट्टी से जुड़े मिट्टीपकड़ पहलवान हैं।

Thursday, 2 June 2011

इक रिदाएतीरगी और ख्वाबे कायनात

दो जून को राज कपूर की तेइसवीं पुण्यतिथि है। उनके जीवन, प्रेम और फिल्मों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है और पुनरावलोकन आज भी जारी है। दो मई को उन्हें दिल्ली जाकर दादासाहब फाल्के पुरस्कार ग्रहण करना था और समारोह के दो दिन पूर्व वे दिल्ली पहुंचे थे। मुंबई से निकलने की पूर्वसंध्या पर शम्मी कपूर, रणधीर कपूर और रवींद्र पीपट उनसे मिलने पहुंचे।

उन दिनों यह खाकसार वहां कंपल्सरी ब्लाइंड की तरह मौजूद होता था। उस समय तक ‘हिना’ के तीन गीत रिकॉर्ड हो चुके थे और पटकथा के भी आधे-अधूरे तीन संस्करण बन चुके थे। उन्होंने उस रात रणधीर कपूर को पांच हजार की टोकन अनुबंध राशि देते हुए कहा कि ‘हिना’ का निर्देशन वही करेंगे। उनकी देखरेख रहेगी, लेकिन शूट रणधीर ही करेंगे, जैसा कि आधी ‘राम तेरी गंगा मैली’ में भी किया गया था। उन्होंने विस्तार से पूरी फिल्म समझाई।

इसके बाद उन्होंने रवींद्र पीपट को भी पांच हजार रुपए दिए। उन्हें आबिद सूरती की कहानी बहुत पसंद थी। उसे भी सविस्तार सुनाया। यहां तक कि उस फिल्म के पहले पोस्टर की डिजाइन क्या होगी, यह भी बताया। यह वही कहानी थी, जिसे वे कुछ वर्ष पूर्व शम्मी कपूर से निर्देशित कराना चाहते थे, लेकिन शम्मी उस वक्त ‘इरमा ला डूस’ से प्रेरित ‘मनोरंजन’ बना रहे थे।

इस लंबी रात के अंत में उन्होंने कहा कि ‘हिना’ को प्रेम के इंद्रधनुष की तरह रचना चाहते हैं, जो सरहदों के ऊपर दोनों मुल्कों को जोड़ता है। ज्ञातव्य है कि इसके तकरीबन दो दशक पूर्व मनमोहन देसाई की फिल्म ‘छलिया’ की शूटिंग के समय उन्हें एक अखबारी कतरन हाथ लगी थी, जिसमें यूएनओ का एक भारतीय मूल का युवा कार चालक बरसात की रात झेलम में बहता हुआ पाकिस्तान जा पहुंचा था, जहां एक खानाबदोश कुनबे ने उसकी जान बचाई थी। वह अपनी याददाश्त खो चुका था और यूएनओ के अफसर की शिनाख्त के बाद पाकिस्तान की जेल से रिहा हुआ था।

राज कपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निर्माण के समय ख्वाजा अहमद अब्बास को ‘हिना’ की पटकथा लिखने के लिए कहा और ‘बॉबी’ के रजत जयंती समारोह में अब्बास साहब ने उन्हें पटकथा सौंपी, जिसका दूसरा संस्करण जैनेंद्र जैन ने लिखा और तीसरा संस्करण पाकिस्तान की लेखिका हसीना मोइन ने लिखा था। उस समय फिल्म के नायक के तौर पर रणधीर कपूर को चुना गया था, लेकिन उनके भाग्य में तो यह लिखा था कि वे वर्षों बाद ऋषि कपूर और जेबा बख्तियार अभिनीत ‘हिना’ को निर्देशित करें। उस छोटी-सी अखबारी कतरन से प्रेरित कथा कोई तीन दशक बाद १९९१ में प्रदर्शित हुई।

अगले दिन शाम की फ्लाइट से दिल्ली जाना था। सामान एयरपोर्ट जा चुका था और श्रीमती कृष्णा कपूर बेचैन थीं कि एयरपोर्ट पहुंचने में ‘कहीं देर न हो जाए!’ राज साहब इत्मीनान से तैयार हुए और निकलने के पहले वे अपने कुत्ते की पीठ सहला रहे थे। उन्होंने महसूस किया कि कुत्ता कुछ अस्वस्थ है। उन्होंने तुरंत कुत्तों के अपने जाने-पहचाने डॉक्टर को फोन लगाया और हिदायत दी कि फौरन आकर उपचार करें। यह सब देखकर श्रीमती कृष्णा कपूर की बेचैनी बढ़ रही थी। उन्हें यह सब अनावश्यक लग रहा था, परंतु ‘जोकर’ के तीसरे भाग में एक कुत्ता नायक के फुटपाथ सर्कस का भागीदार था और उसके कांजी हाउस भेजे जाने पर नायक तड़प उठा था।

राज कपूर ने इत्मीनान से अपने घर और बगीचे को निहारा और कुछ अनिच्छुक से कार में बैठे। क्या उन्हें इलहाम हो गया था कि अब वे शायद न लौटें। उनके जाते ही बीमार कुत्ते ने अजीब-सी करुण चीत्कार निकाली। उन्हें मौत की गंध इतने पहले कैसे आ गई? उस रात तारों को देखकर कुछ अजीब-सा लगा था।

‘इक रिदाएतीरगी है और ख्वाबे कायनात,

डूबते जाते हैं तारे भीगती जाती है रात।’